माता कूष्माण्डा की आराधना से मिलता है संतान का सुख

नई दिल्ली। आदि शक्ति मां दुर्गा के नवरात्रे दिन बा दिन अपने चरम पर आते जा रहे हैं। माता की आराधना का ये पर्व अपने पूरे उफान पर है मां के मंदिर से लेकर पूजा के पंडालों तक माता की आराधना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। हर दिन माता के एक स्वरूप की आराधना का होता है। क्योंकि माता के विभिन्न स्वरूपों की आराधना से भक्त को अलग-अलग ईष्ट की प्राप्ति होती है। मां के चौथे स्वरूप को कूष्माण्डा देवी का स्वरूप माना गया है। शास्त्रों में माता के इस स्वरूप को प्रज्वलित प्रभाकर यानी दहकते सूर्य की चमक जैसा बताया गया है। इस स्वरूप में माता वीर मुद्रा में सिंह पर सवार बताई जाती हैं।

कहा जाता है ये माता का स्वरूप विवाहित स्त्री और पुरूष को लेकर हैं जिसके गर्भ में एक जीवन आने वाला है। इस स्वरूप को गर्भावस्था के स्वरूप में माना जाता है। देवी कूष्माण्डा सभी सिद्धियों के साथ निधियों को प्रदान करने वाली देवी हैं। माता का संबंध सूर्य की साधना से जुड़ा हुआ है। इसलिए जिस भी मनुष्य की कुण्डली में सूर्य से जुड़े घर यानी खाने जैसे लग्न, पंचम और नवम पीड़ित हो या इनमें कोई दिक्कत हो उनके लिए माता की आराधना परम आवश्यक होती है। माता की आराधना से मनुष्य को स्वस्थ तन, मानसिक तनाव से मुक्ति, व्यक्तित्व में निखार और रूप में क्रांति, विद्या में लाभ, प्रेम में सफलता के साथ शरीर में उदर, गर्भाशय औऱ अंडकोष के साथ प्रजनन तंत्र की दिक्कतों से मुक्ति मिल जाती है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार माता की आराधना सूर्य से होती है। तो इनकी आराधना की दिशा पूर्व की होती है। इसके साथ ही माता कूष्माण्डा से ही श्रृष्टि का सृजन हुआ है। अत: इसकी पूजा का उचित समय सूर्योदय काल होता है। इसको रक्त वर्ण के फूल और रक्त चंदन के साथ इनका श्रृंगार किया जाना चाहिए। भोग लगाने के लिए इनको सूजी और घी का बना हुआ हलवे का भोग लगता है। माता की आराधना से निसंतान दम्पतियों को संतान का सुख प्राप्त होता है। माता की आराधना से राजनीति और प्रशासन में अपना कैरियर देखने वालों को सफलता मिलती है। माता की आराधना के लिए माता के इस मंत्र… ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः… का 108 बार प्रात:काल जाप करना लाभ प्रद होता है।