यूपी का चुनावी दंगल भाग-4

लखनऊ। सियासत को लेकर हर दांव लग चुका है। सपा और कांग्रेस एक साथ दम भर रहे हैं। तो बसपा अपना अलग ही राग गा रही है। चारों ओर सियासत के बादल छाए हुए हैं। राजनीति के महारथी अपने अपने तरीकों से रण भूमि में उतर चुके हैं। इस दंगल में उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल के इलाके को साधने के लिए हर दल ने अपनी हुंकार भरी है। क्योंकि सीटों के लिहाज से पूर्वांचल का इलाका इस दंगल में खासा ही महत्व रखता है।


पूर्वांचल पर फोकस क्यूं
सियासी जगत में कहा जाता है जरूरत पड़े तो जानी दुश्मन को भी दोस्त बनाया जाता है। इसी लिहाज से चुनावी मौसम में सभी राजनीतिक पार्टियां इस इलाके अपने रूढ़ों को मनाने में लगी हुई हैं। हर दल अपने-अपने तरीके से यहां के मतदाताओं को रिझाने का प्रयास कर रहा है। पूर्वांचल का ये हिस्सा सूबे की ही नहीं देश की राजनीति का भी अहम हिस्सा रहा है। क्योंकि सूबे की 403 विधान सभाओं में से अकेले पूर्वांचल के हिस्से में 170 सीटें आती हैं। प्रदेश की सियासी गणित का फैसला भी पूर्वांचल ही करता है। जिस पार्टी की लहर पूर्वांचल में होती है, जीत का उसी के कदम चूमती है। पिछले 2012 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को अकेले 106 सीटों पर काबिज हुई थी। सूबे के 28 जिलों में फैले इस 170 सीटों वाले क्षेत्र की प्रदेश की राजनीति में बड़ी वकत है।

पूर्वांचल को लेकर समाजवादी पार्टी की तैयारी
2012 के विधान सभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के हाथों में सत्ता की चाबी इस इलाके में उसकी बंपर जीत का नतीजा थी। ये इलाका समाजवादी पार्टी के लिए उस चुनाव में वरदान साबित हुआ । पार्टी चुनाव जीती ही नहीं सत्ता पर भी काबिज हुई। इसके बाद से उसने सरकार में मंत्रियों में पूर्वांचल को बड़ी महत्वपूर्ण जगह भी दी गई। समाजवादी सरकार ने पूर्वांचल में अपने वोटों को लेकर लगातार योजनाओं के साथ इस इलाके पर अपना ध्यान बनाए रखा। हांलाकि 2014 की मोदी लहर में सपा का बर्चश्व खत्म हो गया केवल आजमगढ़ की सीट ही सपा के पाले में गिरी। लेकिन उसे बाद सपा ने पूर्वांचल पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रोजेक्ट और प्रयास किए हैं। इसीलिए सपा मुखिया ने गाजीपुर से अपने चुनावी अभियान का शंखनाद भी किया।

पूर्वांचल को लेकर बसपा का चुनावी मंथन
पूर्वांचल के जातीय समीकरणों को लेकर मायावती ने 2007 में सत्ता की राह पकड़ी थी। लेकिन पूर्वांचल की लगातार उपेक्षा ने मायावती को 2012 के सत्ता में पहुंचने से रोक दिया था । पूर्वांचल के 28 जिलों में 170 सीटों में बसपा के पाले में महज 23 सीटें ही आई थी। तो लोकसभा के 2014 के चुनाव में सूपड़ा ही साफ हो गया था। इसलिए इस बार मायावती ने पूर्वांचल को साधने के लिए अपने पाले में जातीय समीकरणों के आधार पर चयन की कोशिश की है। यहां के मतदाताओं के अपने खेमे में लाने के लिए जमीनी स्तर पर रैलियों का बसपा सुप्रीमों ने आगाज कर दिया है।

पूर्वांचल को लेकर कांग्रेस की सियासत
प्रदेश में अपनी खोई सियासी जमीन को राहुल गांधी के नाम के सहारे तलाशने उतरी कांग्रेस ने अपने चुनावी अभियान की शुरूआत कर ये साफ किया कि उसकी पहली प्राथमिकता केवल पूर्वांचल ही है। खाट पंचायत का आगाज इसीलिए कुशीनगर से किया। कांग्रेस को ये बात अच्छी तरह मालूम है कि सत्ता की चाभी केवल पूर्वांचल के पास है। अगर पूर्वांचल का किला किसी तरह फतह कर लिया जाये तो सत्ता का सुख सूबे में कांग्रेस को मिल सकता है। इसी के साथ वह एक बार फिर 2019 के लिए अपनी जमीन केन्द्र में बैठने के मकसद से तैयार कर सकती है।

पूर्वांचल को लेकर भाजपा का फोकस
भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावी अभियान की सूबे में पूर्वांचल से शुरूआत की थी। केन्द्र सरकार ने इसके बाद से पूर्वांचल को लेकर लगातार कई बड़ी परियोजनाएं भी दीं हैं। देश के प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र भी पूर्वांचल में है। इसी लिहाज से भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां पर बड़ी जीत दर्ज कर केन्द्र की सत्ता का सफर तय किया था। इसलिए वो अच्छी तरह जानती है। किसी पूर्वांचल को साधे बिना प्रदेश में सत्ता की वापसी सम्भव नहीं है। भाजपा भी लगातार सूबे में रैलियां और यात्राएं निकालकर पूर्वांचल को साधने में जुटी है।

सत्ता के करीब आने और अपनी गणित साधने में अब कोई पार्टी पीछे नहीं है। क्योंकि अब चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। सत्ता की जंग अब 403 सीटों पर जनता के बीच लड़ते हुए सत्ता की सीढी चढ़ना होगा। फिलहाल अभी तक चुनावी दंगल में सिर्फ बातें और वादे ही हो रहे हैं। लेकिन ये जानना भी जरूरी होगा आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठेगा।

अजस्र पीयूष