यूपी चुनाव में कितने पानी में है माया का हाथी

ब्राहम्ण, दलित को एक कर साल 2007 में हुए यूपी विधानसभा चुनावों में अजेय बढ़त बनाने वाली मायावती पर साल 2017 में विधानसभा चुनावों में उम्मीदों पर पानी फिरने के आसार है, क्योंकि जिस बल पर 2007 के विधानसभा चुनावों में उन्हें विजय हासिल हुई थी अब वो जमीनी स्तर पर लागू हो रही है। 4 दशकों तक मायावती जातिवाद और कांग्रेस के सहारे ही प्रदेश की सत्ता में कायम थी। मायावती ने 2007 में राज्य में 14 सालों से चले आ रही गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म करते हुए बसपा ने अपने बूते पर सरकार बनाते हुए सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। यही वो दौर था जब मायावती एक राज्य की नेता से राष्ट्र की नेता बनी।

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मायवाती के राष्ट्रीय नेता बनते ही बसपा को भी राष्ट्रीय स्तर पर मुकाम मिला। हालांकि इतना समय बीत जाने के बाबजूद बसपा वो मुकाम हासिल करने में असफल ही रही है। आज हालात ये है कि उसका उत्तर प्रदेश में भी अस्तित्व खतरे में आ गया है। अब आम जनता जातिवाद के मोतियों की माला को तोड़ विकास के रथ पर सवार होना चाहती है। जनता जान चुकी है कि प्रदेश का विकास कौन करेगा।

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 अखिलेश ने प्रदेश में किया विकास

अखिलेश के शासनकाल की तुलना मायावती के शासनकाल से की जाए तो विकास का पैमाना काफी बदल चुका है। हाईवे का निर्माण,महिलाओं की सुरक्षा के लिए डॉयल 100 जैसी तमाम सुविधाएं दी, जिसने ना सिर्फ लोगों के दिमाग में एक अलग छवि बनाई बल्कि जनता के दिलों में भी घर बना लिया। जनता कहीं ना कहीं मायावती की पहले से लिखी हुई वो स्क्रिप्ट का रहस्य जान चुकी है और जितनी तेजी से अखिलेश का शासनकाल खत्म हो रहा है, उतनी ही तेजी से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ उपर बढ़ रहा है।

प्रदेश के मतदाताओं पर नजर डालें तो ज्यादातर युवा है। युवा रटी-रटाई स्क्रिप्ट को पहचानता है, वो जान चुका है कि रटी हुई स्क्रिप्ट में ज्यादा विकास की संभावनाएं झलकती है या फिर जनता के सामने बिना कुछ दिखें दिल से बोलते हुए।

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 मोदी बनें मायावती के रास्ते में रोड़ा

इन चुनावों में मायावती के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए है नरेंद्र मोदी। लोकसभा चुनावों के बाद जिस तरह से पूरे देश में मोदी की लहर चली है। मायावती के सारे भरोसेमंद नेता उनका साथ छोड़ भाजपा के पाले में आने में लगे हुए है। दिग्गज नेताओं के जाने से मायावती अंदर ही अंदर खुद को खाली महसूस कर रही हैं। देश में मोदी शासन काल में हुए परिवर्तन से लोगों को रूबरू कराने के लिए भाजपा के नेताओं ने परिवर्तन यात्रा कर प्रदेश को एकजुट करने का संदेश दिया है जो मायावती के खिलाफ वो हुकुम का इक्का है जिसका जवाब दे पाना शायद थोड़ा सा मुश्किल है। मोदी की लहर ने ना सिर्फ बसपा के हाथ-पैर फुलाए हैं बल्कि मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस के भी पसीने निकाल दिए है।

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 मुस्लिम दांव कितना सही

 प्रदेश में समीकरणों के लिहाज से देखा जाए तो मायावती के पास एक ही दांव बाकि है वो है मुस्लिम लोगों पर विश्वास करने का लेकिन इस कहानी में ट्विस्ट ये है कि अगर मायावती मुस्लिमों पर भरोसा करती हैं तो उनके मन में खौफ रहेगा कि कहीं वो लोग भाजपा का हाथ ना पकड़ लें।

अगर इतिहास के पन्ने पलट कर खंगाला तो ये कहना गलत नहीं होगा कि राज्य के मुसलमान वोटर सपा का साथ देते आए हैं। लेकिन गत दिनों सपा में मचे सियासी घमासान ने प्रदेश के मुसलमानों के भरोसे को डगमगा दिया है। हालांकि बसपा के नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर खींचने के लिए तमाम प्रयास कर रहे हैं।

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ashu-das  आशु दास