सदन में त्रिवेंद्र सरकार ने पेश किया लोकायुक्त विधेयक

देहरादून। राज्यपाल अभिभाषण में भ्रष्टाचारमुक्त सुशासन के संकल्प के चार दिन बाद ही राज्य की नई भाजपा सरकार तुरंत एक्शन में आ गई।
सरकार ने अपने पहले विधानसभा सत्र में ही लोकायुक्त और लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानांतरण विधेयक सदन में पेश कर दिया। अचानक उठाए गए सरकार के इस कदम से विपक्षी कांग्रेस भौंचक रह गई।

लोकायुक्त विधेयक सदन के पटल पर पेश करने के बाद उसे विचार के लिए प्रवर समिति के पास भेज दिया। त्रिवेन्द्र सरकार के इस लोकायुक्त विधेयक में भ्रष्टाचार के मामलों में मुख्यमंत्री, मंत्रियों के साथ ही राज्य सरकार के कार्मिकों को लोकायुक्त के दायरे में लिया गया है। वर्ष 2011 के खंडूडी सरकार के लोकायुक्त कानून को लागू किए जाने के राज्य सरकार के दावे के बावजूद नया विधेयक कुछ अलग है।

पिछले कानून की तर्ज पर इसमें लोकायुक्त एक्ट बनने के बाद 180 दिन के भीतर लोकायुक्त की नियुक्ति किए जाने के प्रावधान को शामिल नहीं किया गया है।
साथ ही नए विधेयक में अधीनस्थ न्यायालयों को लोकायुक्त के अधीन रखने का प्रावधान शामिल नहीं किया गया है। इसके स्थान पर लोकायुक्त की सिफारिश पर हाईकोर्ट के परामर्श से विशेष न्यायालयों का गठन किया जा सकेगा।

लोकायुक्त संस्था प्रारंभिक जांच में दोषी पाए जाने वाले लोक सेवक को तलाशी लेने, निलंबित करने, स्थानांतरण और संपत्ति कुर्क करने की सिफारिश तो कर सकता है, लेकिन खुद दंडित नहीं कर सकेगा। खंडूंरी के लोकायुक्त कानून के दायरे में अधीनस्थ न्यायपालिका को भी शामिल किया गया था। साथ में लोकायुक्त को निलंबित करने से लेकर दंडित करने के अधिकार दिए गए थे।

अधीनस्थ न्यायपालिका को दायरे में लेने का प्रावधान पर तकनीकी अड़चन पैदा हो गई थी। इसके चलते पिछली कांग्रेस सरकार ने इस प्रावधान को हटा दिया था। नई भाजपा सरकार ने लोकायुक्त विधेयक में खास ख्याल रखा कि उक्त तकनीकी अड़चन न आने पाए। लिहाजा यह प्रावधान शामिल नहीं किया गया। नए विधेयक में लोकायुक्त के पास कतिपय मामलों में सिविल न्यायालय की शक्तियां रहेंगी। लोकायुक्त के लिए चयन समिति, खोजबीन समिति की व्यवस्था पिछली कांग्रेस सरकार के लोकायुक्त एक्ट के मुताबिक है।

विधेयक में यह प्रावधान शामिल है कि चयन समिति की सिफारिश पर पुनर्विचार को राज्यपाल एक बार चयन समिति को परामर्श दे सकेंगे, लेकिन चयन समिति के पुनर्विचार के बाद की गईं सिफारिश को राज्यपाल को स्वीकार करना होगा। लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने और निलंबन का प्रावधान भी रखा गया है।