मंदोदरी और रावण के विवाह का साक्षी है ये मंदिर जाने खबर में पूरा इतिहास

नई दिल्ली। सावन का महीना हो और भोलेनाथ के जयकारे ना गूंजे ऐसा भला कहां हो सकता है। इस वक्त सावन पूरे शबाब पर है। चारों ओर जयबम भोले के जयकारे लग रहे हैं। इस महीने में बड़ी संख्या में भोले नाथ के श्रद्धालु कांवड़ लेने जाते हैं। लेकिन भोलेनाथ का एक बडा जुड़ाव मेरठ से भी है। मेरठ के कैंट सदर थाने के पास एक ऐसा मंदिर है जो कि रामायण के समकालीन होने का बड़ा इतिहास रखता है। इसके साथ ही रामायण के एक बड़े पात्र से भी जुड़ा है ये मंदिर जहां पर भोलेनाथ की परम कृपा रहती है।

मान्यता है कि मयदावन की एक कन्या थी जिसका नाम मैराष्ट्र था वह रोज इसी शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ की आराधना करने के लिए आती थी। उसकी तपस्या और आराधना से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उसे इस संसार के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से शादी करने का वरदान दिया था। इसी मंदिर में एक दिन उसकी मुलाकात लंकाधिपति रावण से हो गई । इसी मंदिर में उन दोनों के बीच प्रेम प्रसंग शुरू हुआ । जो कि इसी मंदिर में विवाह के फलस्वरूप बदल भी गया।

मंदिर के पुजारी पवन गर्ग की माने तो मंदोदरी के प्राचीन नाम मैराष्ट्र पर ही मेरठ का नामकरण हुआ है। रावण और मंदोदरी ने इसी स्थान पर भगवान भोलेनाथ का अभिषेक कर पूजन किया था। इस मंदिर में रावण भोलेनाथ की आराधना के लिए आया करता था । जहां पर मंदोदरी से मुलाकात हुई थी। जिसके बाद दोनों का विवाह भी इसी मंदिर में भगवान भोलेनाथ के समक्ष संपन्न हुआ था।

मान्यता है कि मंदिर के पास स्थित भैसाली मैदान उस वक्त में सरोवर हुआ करता था। जहां मंदोदरी नहाने के बाद मंदिर में जाया करती थी। वही सावन के महीने सैकड़ों की संख्या में भगवान भोले नाथ के श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना करने आते हैं। मान्यता है कि यहां आकर भोले नाथ से कुछ भी मांगों तो अपने भक्तों की इच्छा भोले नाथ जरूर पूरी करते हैं। आज भगवान भोलेनाथ की सावन में शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर परिसर में महाकाल की विशेष पूजन और अर्चन की व्यवस्था की गई थी।