ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे हुए है टाईगर रिजर्व जोन का किला

लखीमपुर खीरी। लखीमपुर मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर टाईगर रिजर्व जोन के किले जंगल के मेले की तैयारियां चालू हो गई है। यह मेला शहीदों की याद में लगाया जाता है। यह जंगल तमाम ऐतिहासिक धरोहर को समेटे हुए है। जिसमें महत्मा बुद्ध के समय का रहस्य छुपा है। किला चौकी के पास बने द्वार पर पत्थरों को काटकर बनाया गया है उसी के नाम से इसे किला नाम दिया गया। इसमें गुप्त पत्थरों के ऊपर लिखी गई भाषा गुप्त काल के समय की मानी जा रही है। यह मेला 2 अप्रैल को लगाया जाएगा।

लखीमपुर मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर सागौन के घने जंगलों में स्थित इस किले में प्रतिवर्ष रात के समय में मेले का आयोजन किया जाता है। इस बार यह मेला 2 अप्रैल को लगेगा। रात में लगने वाले इस विशाल मेले में पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। शहीदों की याद में लगने वाले इस मेले में सभी समुदाय के लोग शिरकत करते है। किले के नाम से प्रसिद्व इस गेट पर करीब दो सौ मीटर लंबी लाहौरी ईंटों की दीवार बनी है। इसका कुछ हिस्सा जमीदोज हो चुका है। यह दूर फैला वन क्षेत्र पुरातत्व विभाग को भी अपनी ओर खींचता है। पुरातत्व विभाग इस जंगल को आये और वन क्षेत्र में खुदाई कर एक पत्थर का घोडा प्राप्त किया जिसे राजधानी में प्राणी उद्यान के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। किला गेट का निर्माण सम्राट समुन्द्र गुप्त ने कराया था क्योंकि वह अपने कैदियों को रखने को लिए बहुत दूर एक किले का निर्माण कराया था।

सेल्यूकस नामक राजा ने आक्रमण कर समुन्द्र गुप्त को पराजित किया था। अंग्रेजो को भी यह जगह खूब रास आई उन्होंने इसे विश्रामगृह में बदल लिया। अंग्रेज जंगली जानवरों का शिकार करते थे। यह वन क्षेत्र संरक्षित हुआ है तभी यहाँ एक वन चौकी स्थापित की गई जिसका नाम किला चौकी रखा गया। आज भी इस संरक्षित क्षेत्र में अनेकों देवी देवताओं के मंदिर है जो यहां के निवासियों के लिए आस्था बिंदु है।यहां पर धार्मिक अनुष्ठान निरंतर होते है। बताते हैं कि यहां पर रूक्मणी जी की मानसरोवर, उनके पूजा करने का मंदिर, रामदास बाबा की मजार के अलावा कई लोगों की मजारे भी मौजूद है।

मेले के संबंध में जानकारी देते हुए पार्क रेंजर अशोक कश्यप ने बताया मेले की सूचना सिंगाही पुलिस के साथ सभी प्रशासनिक अधिकारियों को दे दी गई है। गौरतलब है कि दुदवा नेशनल पार्क के जंगल में लगने वाले इस ऐतिहासिक मेले में जमकर भीड़ होती है। और इसबार मेले कुछ एैसी सुविधांए की जायंगी जिससे कि जंगल मे ज्यादा गंदगी न हो और दुकानदार पालीथीन की जगह पर पत्ते व कुल्हड का प्रयोग करने के लिये प्रेरित किया जायगा।

 -मसरूर खान