जन्मदिन स्पेशल: राम प्रसाद बिस्लिम की आखरी इच्छा थी हिंदू मुस्लिम एकता

नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली, सुरेश प्रभु और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की जयंती पर उन्हें नमन किया है और उनके जन्मदिवस पर श्रद्धांजलि दी। राम प्रसाद एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनका बलिदान कभी भूलाया नहीं जा सकता। राम प्रसाद ने आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ट्विटर संदेश में कहा, भारत माँ के वीर सपूत जिनकी लिखी पंक्तियाँ मात्र ही हृदय में राष्ट्रभक्ति का सैलाब ले आए,ऐसे अमर बलिदानी राम प्रसाद बिस्मिल को कोटि-कोटि नमन। उन्होंने अपने ट्विटर पर राम प्रसाद बिस्मिल की पक्तियां, ‘हाथ जिनमें हो जुनूं, कटते नहीं तलवार से, सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से, और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ को भी साझा किया है।

बता दें कि रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी कांड जैसी कई घटनाओं में शामिल होने की वजह से महज 30 वर्ष की उम्र में 19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। राम प्रसाद ने आजादी के संघर्ष में ऐसी भूमिका निभाई कि कोई निभा ही नहीं सकता। राम प्रसाद बिस्मिल ने देश को गुलामी का बेड़ियों से आजाद कराने के लिए अपना सब कुछ देश पर कुर्बान कर दिया। इनके जीवन पर बात की जाए तो इनके परिवार में पहले एक बेटे का जन्म हुआ था जिसकी मौत किसी अज्ञात बिमारी का वजग से हो गई थी। उसके बाद राम प्रसाद का जन्म हुआ और इनको लेकर इनकी दादी सतर्क रहने लगी। लेकिन इनको भी उस बिमारी ने घेर लिया जिसकी वजह से उनके भाई की मौत हुई थी।

राम प्रसाद बिस्मिल को 6 साल की उम्र में उनके पिता पढ़ाई कराने लगे क्योंकि इनके पिता को पढ़ाई का अच्छा ज्ञान था। बिस्मिल के पिता उनकी पढ़ाई को लेकर काफी सख्त रहते थे। इसलिए वो राम प्रसाद को बहुत ही कठोर व्यवहार के साथ पढ़ाई कराते थे। बिस्मिल के पिता उनकी पढ़ाई को लेकर इतने सख्त थे कि एक बार उनके उ न लिख पाने पर उनके पिता ने उन्हें लोहे की छड़ से इतना पीटा की वो लोहे की छड़ भी टेड़ी हो गई। सात की उम्र में उन्हें उर्दू की पढ़ाई के लिए मौलवी के पास भेजा गया। जहां उन्होंने उर्दू की शिक्षा ली। कम उम्र में ही उन्होंने आठवी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। परिवार में कुछ परेशानियों के चलते उन्होंने आगे की पढ़ाई नही की।

बता दें कि बिस्मिल के ऊपर उनकी मां के व्यक्तित्व का काफी गहरा प्रभाव पड़ा। इसलिए उनका मानना था कि उनके जीवन की सफलताओं का श्रय उनकी मां को जाता है। अपनी मां के बारे में उनका कहना था कि अगर मुझे ऐसी मां नहीं मिलती तो शायद मैं भी एक साधर आदमी का तरह अपना जीवन जा रहा होता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की, जैसी मेजिनी की उनकी माता ने की थी। माताजी का मेरे लिए सबसे बड़ा उपदेश यही था कि किसी की प्राण न लो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राण दण्ड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन एक-दो बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी।

काकोरी कांड में बिस्मिल की भूमिका

काकोरी कांड के लिए राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 10 लोगों ने सुनियोजित कार्रवाई के तहत यह काम करने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रहे पैसे को लूट लिया। उन्होंने ट्रेन के गार्ड को बंदूक की नोक पर काबू कर लिया। गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिज़ोरी को तोड़कर आक्रमणकारी दल चार हज़ार रुपये लेकर फरार हो गए। इस डकैती में अशफाकउल्ला, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, सचीन्द्र सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त, रामप्रसाद बिस्मिल आदि शामिल थे। काकोरी षड्यंत्र मुकदमे ने काफ़ी लोगों का ध्यान खींचा। इसके कारण देश का राजनीतिक वातावरण आवेशित हो गया।

इस दिन दी गई राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी

19 दिसम्बर, 1927 की सुबह बिस्मिल नित्य की तरह चार बजे उठे। नित्यकर्म, स्नान आदि के बाद संध्या उपासना की। अपनी माँ को पत्र लिखा और फिर महाप्रयाण बेला की प्रतिज्ञा करने लगे। नियत समय पर बुलाने वाले आ गए। ‘वन्दे मातरम’ तथा ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करते हुए बिस्मिल उनके साथ चल पड़े और बड़े मनोयोग से गाने लगे-

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे.
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे..
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे.
तेरा ही ज़िक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे
और इस गीत के साथ ही वो हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए।