विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाना जावड़ेकर की चुनौती 

नई दिल्ली| प्रकाश जावड़ेकर को एक ऐसे मंत्रालय का प्रभार मिला है जो भारतीय विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाने की प्रधानमंत्री की इच्छा के मार्ग में बाधक बनता प्रतीत हो रहा था। जावड़ेकर का पहला कदम उनके मंत्रालय द्वारा पहली बार बनाए गए राष्ट्रीय श्रेणी क्रम को व्यवस्थित करना हो सकता है।

prakesh javadekar

छात्रों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भारत श्रेणी क्रम (इंडिया रैंकिंग) 2016 के मानदंडों में तीन मुख्य कमियां हैं, जिन्हें विश्व स्तर पर श्रेणी क्रम बनाने के लिए टाइम्स जैसी संस्था उपयोग में लाती है। टाइम्स उच्च शिक्षा विश्व विश्वविद्यालय श्रेणी क्रम (रैंकिंग) दुनिया के सबसे अच्छे विश्व विद्यालयों की एक सूची है। टाइम्स साल 2004 से यह सूची बना रही है।

इंडिया स्पेंड के अनुसार, राष्ट्रीय संस्थानों के श्रेणी क्रम बनाने के लिए जो भारतीय मानक अपनाए जाते हैं उनमें डॉक्टर की डिग्री दिए जाने, संस्थानों की आय और विश्व में भारतीय विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा के बारे में सूचना का अभाव है। इसके अलावा भारतीय संस्थानों में सामान्यत: शिक्षक-छात्र, महिला-पुरुष और स्थानीय-अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के अनुपात वैश्विक संस्थानों की तुलना में कम हैं।

टाइम्स के श्रेणी क्रम (रैंकिंग)के अनुसार कैलिफोर्निया प्रौद्योगिकी संस्थान या कैलटेक विश्व का सबसे बढ़िया विश्वविद्यालय है। भारत में भारतीय विज्ञान संस्थान सबसे अच्छा है, जिसे वैश्विक सूची में 251 से 300 के बीच स्थान मिला है।

यह भारत का अकेला उच्च शिक्षण संस्थान है, जिसको विश्व की सूची में शीर्ष 300 संस्थानों में जगह मिली है जबकि चीन के तीन विवविद्यालय दुनिया के 100 शीर्ष संस्थानों में शामिल हैं।

सस्ते विश्वस्तरीय डिग्री पाठ्यक्रमों में आम भारतीय छात्रों के प्रवेश के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र चाहते हैं कि अगले पांच साल में शिक्षा की दृष्टि से 10 सरकारी और निजी संस्थान तथा शोध संस्थान विश्वस्तरीय बन जाए, लेकिन यह देश के लिए अपर्याप्त है क्योंकि उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वे 2014-15 के अनुसार देश के 716 विश्व विश्वविद्यालयों और 38056 कॉलेजों में 3.33 करोड़ छात्र दाखिला लिए हुए हैं।

भारतीय रैंक्रिग की कमियां :

टाइम्स उच्च शिक्षा मानकों के अनुसार डॉक्टर डिग्री दिए जाने के बारे में सूचना से पता चलता है कि अगली पीढ़ी के शिक्षक तैयार करने को लेक र संस्थान कितना प्रतिबद्ध है, लेकिन भारतीय रैंकिंग 2016 में इसकी अनदेखी की गई है।

विश्वविद्यालयों को श्रेणीबद्ध करने के लिए भारतीय रैंकिंग के मानकों में किसी तरह की आय का जिक्र नहीं है, जबकि टाइम्स उच्च शिक्षा का मानना है कि संस्थागत आय से छात्रों और शिक्षकों के लिए उपलब्ध मूल भूत सुविधाओं के बारे में मोटे तौर पर जानकारी मिलती है।

इसी तरह शोध के लिए आय विश्वस्तरीय अनुसंधान के विकास के लिए आवश्यक है और औद्योगिक आय से पता चलता है कि व्यापार क्षेत्र अनुसंधान के लिए कितना भुगतान करना चाहता है और बाजार से वित्त आकर्षित करने की एक विश्वविद्यालय की क्षमता कितनी है।

महिंद्रा समूह के हैदराबाद स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर बिष्णु पी. पाल ने कहा, “विकसित देशों में भविष्य में उपयोग की संभावना के मद्देनजर उद्योग नए विचारों के लिए विश्वविद्यालयों की ओर देखते हैं। भारतीय उद्योगों की भी मांग अधिक है। वे समस्या विशिष्ठ अनुसंधान की तलाश में रहते हैं, जिसकी परिणति प्रारूप उपकरण या प्रक्रिया के रूप में होती है, ताकि तेजी से उत्पादों का विकास हो सके।”

विशेषज्ञों ने कहा कि जहां तक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा आंकने का सवाल है तो टाइम्स सर्वे मानक के रूप 50 प्रतिशत शिक्षण अंक और 60 प्रतिशत शोध अंक को शामिल करता है जबकि भारत श्रेणी क्रम (रैंकिंग) में सभी पक्षों के अंकों को शामिल किया जाता है। यह पर्याप्त नहीं है।

ये मानक भारत श्रेणी क्रम (रैंकिंग) और टाइम्स रैंकिंग में दिखते हैं। इसके अलावा और भी क्षेत्र हैं, जहां भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान काफी पीछे हैं।

उदाहरण के तौर पर भारतीय विज्ञान संस्थान में छात्र और शिक्षकों का अनुपात 1: 8.2 है, जबकि कैलटेक में यह अनुपात 1: 6.2 है। इसी आधार पर दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग टाइम्स रैंकिंग 601 से 800 के बीच है, क्योंकि इसका छात्र-शिक्षक अनुपात 1: 22.9 है जबकि वह देश में छठे नंबर पर है।

इसी तरह विदेशी व स्थानीय छात्र, महिला-पुरुष, देशी-विदेशी कर्मचारी अनुपातों की दृष्टि से भी भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान विश्व के मानक संस्थानों से पिछड़े हुए हैं।
(आईएएनएस)