आतंकवाद, अलगाववाद की फसल से भारत को कमजोर करने की कोशिश

कभी-कभी अधिक लचीलापन और सहृदयता खुद के लिए समस्या बन जाती है। हमारी इसी नीति का नतीजा है कश्मीर समस्या। कश्मीर भारत के लिए राजनीतिक, ग्लोबल कूटनीति का मसला बन गया है। भारत से कश्मीर छीनने के चक्कर में तीन बार पराजित होने के बाद भी पाकिस्तान की नींद नहीं टूट रही है। इसका नतीजा है कि आतंकवाद, अलगाववाद की फसलें तैयार कर, आतंरिक रूप से वह भारत को कमजोर करना चाहता है। भारत-पाकिस्तान को विभाजित हुए सात दशक का लंबा वक्त गुजर गया है लेकिन यह समस्या जस की तस बनी है। इसकी वहज है वहां आम आदमी सबसे अधिक परेशान है जबकि पाकिस्तान कश्मीर में खुलेआम आतंकवाद भड़का रहा है। हमारी सेना को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

सुरक्षाबलों का मनोबल घटाने के लिए पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की तरफ से रोज-रोज नई साजिश रची जाती है। कश्मीर को जीतने का पाकिस्तान का नापाक सपना कभी भी साकार नहीं हो सकता, इसकी वजह है की वहां का आम आदमी भारत के साथ है। कुछ मुट्ठी भर बहके युवा आतंकी संगठनों के हाथ का लट्टू बने हैं, क्यों कि उन्हें इसके बदले पैसे दिए जाते हैं। दूसरी तरफ इस समस्या के लिए लोकतांत्रित तरीके से चुनी जानेवाली वहां की स्थानीय सरकारें भी जिम्मेदार हैं। वह चाहे बाप-बेटे की सरकार रही हो या फिर बाप-बेटी की। सभी ने राष्टीय नीतियों की वकालत के बजाय दबी जुबान अलगाववादियों का साथ दिया। दूसरी वजह राजनीतिक विचारधारा की असमानता वाले दलों का बेमेल गठजोड़ भी कारण बना। वह चाहे कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस का एलायंस रहा हो फिर भाजपा-पीडीपी का। सरकार को पत्थरबाजों पर शख्त रवैया अख्तियार करते हुए दोटूक नीति अपनानी होगी। इंडिया गोबैक का नारा लगाने वालों को यह संदेश जाना चाहिए की पत्थरबाजों और आतंकियों भारत छोड़ा और पाकिस्तान जाओ।

पाकिस्तान और आतंकी संगठन भारत से सीधा मुकाबला नहीं कर सकते, लिहाजा युवाओं को पैसे देकर पत्थरबाजों की फौज खड़ी की गई है। सेना के जवानों के साथ बदसलूकी की सीएमाएं लांघी जा रही हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बाधा डाली जा रही है। लोग भय की वजह से अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। श्रीनगर के बड़गाम लोकसभा के उपचुनाव में किस तरह हिंसा हुई, जिसमें हमारे कई जवान शहीद हो गए। काफी संख्या में मतदान में लगे लोग, सेना के जवान जख्मी हो गए। अलगाववादियों ने पोलिंग बूथों को आग के हवाले कर दिया। पत्थरबाजों की टोली ने हमारे सीआरपीएफ के जवानों के साथ जिस तरह का सलूक किया, उस वायरल वीडियो को देख पूरे हिंदुस्तान का खून खौल उठा।

जिस तरह युवा कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं ,यह बात किसी से छुपी नहीं है। लालचौक में छात्र सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। आतंकी संगठन भालेभाले युवाओं और किशोरों को आगे ला अपनी नीति सफल करने में लगा है। इस तरह से अलगाववाद और आतंक की एक नई पौध तैयार होगी। हलांकि इनकी संख्या बेहद कम है। आम कश्मीरियों को सिर्फ बंदूक के बल पर दबाने की साजिश रची जा रही है। लोग सुरक्षा बलों को चांटे मार रहे हैं और मुख्यमंत्री महबूबा सेना को संयम बरतने की सलाह दे रही हैं। पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला पत्थरबाजों को राष्टभक्त बता रहे हैं। जरा सोचिए वहां की सरकार और प्रतिपक्ष की क्या सोच है। आप उम्मीद कर सकते हैं इस तरह से कश्मीर समस्या का हल निकलेगा।

पत्थरबाजों को राष्टभक्त बताने वाले फारुक को पता नहीं कि सात फीसदी वोटिंग के बदौलत उन्हें राज्य का प्रतिनिधि कहलाने का कोई हक नहीं बनता है। दूसरे राज्यों में जहां वोटिंग के दौरान 60 से 70 फीसदी मतदान हुआ, वहीं कश्मीर में उपचुनाव में आठ फीसदी से भी कम वोड पड़े। हिंसा के बाद रिपोल में तो स्थिति बेहद चिंताजनक रही, केवल दो फीसदी वोटिंग हुई। जरा सोचिए, कश्मीर किस दिशा की तरफ बढ़ रहा है। दो से आठ फीसदी वोटिंग के बाद फारुख अब्दुल्ला सासंद चुन लिए गए। 70 फीसदी पोलिंग बूथ खाली पड़े रहे। 2014 में यहां 26 फीसदी वोटिंग के बाद फारुक अब्दुला की पराजय 42 हजार वोटों से हुई थी। लेकिन लोकतंत्र की कीतनी बिडंबना है की सात फीसदी पोल के बाद भी उपचुनाव में वह जीत गए। श्रीनगर संसदीय इलाके में वोटरों की संख्या साढ़े 12 लाख से अधिक है। जबकि वोटिंग करने वालों की तादात सिर्फ 90 हजार थी। यहां 1999 में सबसे कम तकरीबन 12 फीसदी वोटिंग हुई थी। कश्मीर में अलगाववादियों को किस तरह की आजादी चाहिए, यह पता नहीं। उन्होंने कभी सिंध और बलोच की अंतहीन त्रासदी पर करीब से देखने की कोशिश नहीं की। पत्थरबाज जिस तरह भारत विरोधी नारे लगाते हैं और जवानों पर चाटा जड़ते हैं। इंडिया गोबैक के नारे लगाए जाते हैं। क्या यह सब सिंध और बोलोच में जाकर किया जा सकता है। यहीं अलगाववादी पाकिस्तान के खिलाफ क्या यह सबकुछ कर सकते हैं। पत्थरबाजों में हिम्मत है तो यह सब पाकिस्तन में दिखाएं, फिर पता चल जाएगा की आजादी का क्या मतलब होता है।

अगर हम बंग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करने की ताकत रखते हैं तो कश्मीर भी ठीक कर सकते हैं, लेकिन सवाल है कि उसमें ऐसे बेगुनाह मारे जाएंगे जिनका कोई दोष नहीं है। भारत की इसी कमजोरी का आतंकी संगठन और पाकिस्तान बेजा लाभ उठाना चाहता है। कश्मीर में चुनी हुई सरकार है लेकिन उसका कोई मतलब नहीं दिखता है। सरकार को सोचना होगा कि पत्थरबाजों को इतनी छूट क्यों दी गई है। सेना के साथ इस तरह की बदसलूकी क्यों की जा रही है। जब हमारी सेना आतंकियों से मुठभेंड लेती है तो पत्थरबाज सामने आ जाते हैं। कश्मीर में चरमपंथ किस तरह हावी है, पिछले दिनों सोशलमीडिया में वायरल हुए वीडियो से अंदाला लगाया जा सकता है। इसमें चुनावी ड्यूटी पर गए जवानों पर थप्पड़ मारे जा रहे हैं। सेना की जीप पर पत्थरबाज को बांध कर घुमाना मानवाधिकार का उल्लंघ होता है, लेकिन देश रक्षा में समर्पित जवानों के मुंह पर चांटा मारना क्या देश भक्ति है।

सरकार को कश्मीर पर ठोस नीति बनानी होगी। आतंकवाद पर हमें अमेरिकी नीति अपनानी होगी। अफगानितस्तान में आईएसआई के सफाए के लिए जिस तरह अमेरिका ने कदम उठाया, उसी नीति का हमें अनुसरण करना होगा। बम गिराने से पहले अमेरिका ने क्या किसी से राय मांगी थी। अगर नहीं तो फिर हम अमेरिकी सीनेट में कश्मीर पर विलाप कर कुछ नहीं कर सकते।

अंतरराष्टीय समुदाय को विश्वास में लेना हमारी कूटनीतिक रणनीति हो सकती है। फिर भी कश्मीर और पाकिस्तान का इलाज हमें अपने तरीके से करना होगा। जिस तरह चीन को तिब्बत पर पीड़ा होती है, उसी तरह कश्मीर हमारे लिए है, चीन को भी यह समझना होगा। हम अमेरिका से पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने की मांग करते हैं लेकिन खुद नहीं करते। दुनिया के देश कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान को उलझा कर रखना चाहते हैं। क्योंकि उसमें एक दूसरे की अपनी रणनीति है। कश्मीर के हालात दिन-ब-दिन खबरा होते जा रहे हैं। इंडिया गोबैक का नारा चुभता है। वक्त अब अलगाववादियों को साफ-साफ संदेश देने का है कि आतंकियों और पत्थरबाजों भारत छोड़ो, पाकिस्तान आजो। जिस तरह तुम्हे अलगाववाद से लगाव है उससे कई गुना भारतवंशियों का कश्मीर से लगाव है। रियासती समझौते में कश्मीर का भारत में विलय हुआ था और उसे भारत से कोई नहीं छीन सकता है। कश्मीर एक तरफ जहां भारत की शान है, वहीं पाकिस्तान की पराजय का प्रतिकार है। यह बात अच्छी तरह पत्थरबाजों को समझ लेनी चाहिए।

(प्रभुनाथ शुक्ल, लेख साभार हिंन्दुस्थान समाचार)