सोलंकी सिस्टर है रियल लाइफ दंगल

आगरा। ताजमहल के लिए विश्व विख्यात आगरा में कई रियल हीरो भी है जिन्होंने हाल में रिलीज फिल्म दंगल की थीम को सच साबित कर दिखाया। दंगल फिल्म की कहानी की पूरे देश में चर्चा हो रही है। पूरी फिल्म फोगाट सिस्टर के नाम है जो असली कहानी पर आधारित है। लेकिन आगरा के मलपुरा के सहारा गांव में भी फिल्म दंगल से भी दमदार कहानी मौजूद है। यहाँ भी फिल्म के आमिर खान की तरह विशंभर सिंह सोलंकी मौजूद है जिन्होंने अपनी बेटियो को पहलवान बनाया। वे खुद पहलवान थे लेकिन वे पदक नही ला सके। तो अपना सपना बेटे के नाम कर दिया। बेटे की चाहत में उनको सात बेटिया हो गई और उनका सपना टूटने लगा। फिर विशंभर सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने बेटियों को बेटे की तरह पाला। उनकी सात बेटियों में से अब सीमा सोलंकी, नीलम सोलंकी और पूनम सोलंकी पहलवानी कर रही हैं। समाज की लोक लाज से बचने के लिए उन्होंने अपनी बेटियों के लिए घर में ही अखाड़ा बना दिया और कुस्ती के दांव सिखाने लगे।

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समाज से लड़नी पड़ी लड़ाई

आगरा के साहरा गांव में पहले बेटियों ने कुस्ती लड़ने से पहले समाज से भी लड़ाई लड़ी। गरीब परिवार की ये सातों बेटियो ने पिता के हौसले को पूरा कर दिखाया। गांव में विशम्भर सोलंकी का छोटा सा घर है जिसमें उन्होंने बेटियो के कुस्ती के लिए अखाडा बना रखा है। ये बेटिया पढ़ती भी और कमाती भी है। सुबह कुस्ती लड़ने के बाद सोलंकी सिस्टर घर में किराने की दुकान चलाती है और फिर बाजार में सामान भी बेचती है फिर जो पैसे मिलते है उससे उनकी पहलवानी की खुराक तैयार होती है। पिता भी बेटियों के लिए बुढ़ापे में कमाई करते है जिससे उनका ओलम्पिक का सपना पूरा हो सकें।

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4 बेटियों की हो चुकी है शादी

पिता विश्मभर सोलंकी की कड़ी मेहनत से आज उनकी दंगल की फिल्म से भी दमदार कहानी तैयार है। उनकी सात बेटिया है जिसमे चार की शादी हो चुकी है लेकिन वो आज भी कुस्ती लड़ने जाती है। उनकी बेटीयों ने हरिद्वार में पतंजलि द्वारा दंगल में जलवा दिखाया था। तीनों बहनों ने अपनी विरोधी पहलवानों को धूल चटाई थी। इस पर बाबा रामदेव की ओर से उन्हें 51 हजार रुपए और पांच कनस्तर देशी घी भेंट किया गया था। नीलम सिंह ने 2015 में कर्नाटक में हुई नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर शहर का नाम रोशन किया। उनकी बड़ी बहन सीमा और छोटी बहन पूनम भी स्टेट में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। नेशनल में नीलम कास्य पदक जीत चुकी है। अब एक ही सपना है उनकी बेटिया ओलम्पिक में खेले और देश के लिए पदक जीते।

लड़कियों के पिता का कहना है कि उनकी बेटियों को अगर एक अच्छा कोच और सरकारी मदद मिलेगी तो ये निश्चित देश के लिए ओलम्पिक में पदक की उम्मीद बन सकेंगी।

rp_rinkitomar_agra रिंकी तोमर, संवाददाता