माता ब्रह्मचारिणी को चीनी का अपर्ण कर पाएं दीर्घायु होने का आशीष

नई दिल्ली। शारदीय नौ रात्रि का पर्व आते ही माता के भक्तों की आमद से देवी मंदिर गुलजार हो जाते हैं। मां के नौ रूपों की आराधना करने के लिए भक्त मां के मंदिरों में शक्ति पीठों पर आते हैं। हर दिन मां के एक स्वरूप की आराधना होती है। नवरात्रि का दूसरा दिन माता के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की उपासना से जुड़ा होता है। माना जाता है कि इस स्वरूप में ब्रह्म का अर्थ तपस्या और चारिणी का मतलब शुद्ध आचरण से है। अर्थात माता की आराधना करने का तप करने के लिए धारण किए जाना वाला शुद्ध आचरण ही मां की आराधना है।

मां ब्रह्मचारिणी के स्वरूप में माता शांत और तप में लीन हो भक्तों को अपना दर्शन देती हैं। माता के चेहरे पर कठोर तप की लालिमा और तेज की कांति दमकती है। मां के चेहरे की चमक से ही तीनों लोकों में उजाला फैला हुआ है। माता के इस स्वरूप में माता एक हाथ में अक्ष माला और दूसरे में कमण्डल लिए हुए भक्तों की मनोकामना पूरी कर रही है। माता का ये स्वरूप मां पार्वती के जीवनकाल से जुड़ा है। जिस वक्त वो भगवान शिव को अपने पति के स्वरूप में पाने के लिए कठोर तपस्या में लीन थी। मान्यता है कि माता पर्वती ने भगवान शिव को पति के स्वरूप में पाने के लिए पहले कई वर्षों तक फलों का सेवन कर तप किया फिर बेल पत्र का सेवन करती रहीं अन्त में निराहार रहकर तप किया। जिसके बाद भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर माता की मनोकामना पूर्ण की थी।

माता का ये स्वरूप भक्तों को सिद्ध का अमोघ फल प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। माता की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार की वृद्धि होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से भक्तों को सिद्धि के साथ विजय की प्राप्ति होती है। जीवन में आने वाली समस्याओं और परेशानियों से माता की आराधना से छुटकारा मिल जाता है। माता का ये स्वरूप सदाचार से जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने वाला है।

माता के दूसरे स्वरूप की आराधना के लिए भक्तों को इस दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए और ब्राह्मणों में चीनी का दान करना चाहिए। कहा जाता है कि चीनी का दान इस दिन करने से भक्त दीर्घायु होता है। माता की आराधना करने के लिए कलश में सभी देवी देवताओं को आमत्रित करते हुए उस परइन देवताओं का पंचामृत से अभिषेक करें। इन्हे आसन प्रदान करते हुए वस्त्र दे भोग लगाकर आरती करें। इसके बाद इसना आचमन करते हुए पान, सुपारी भेंट कर कुछ दक्षिणा दें। माता का पूजन करने के बाद नवग्रह, दशदिक्पाल और ग्राम देवता का पूजन करें। देवी की आराधना करते हुए हाथों ने अक्षत,फूल,दक्षिणा के साथ जल लेकर कहें… दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा…इसके बाद इसे कलश पर अर्पित करें।