अयोध्या कांड की बरसी के पहले रामनगरी की बढ़ी हलचल

ठीक अयोध्या कांड की बरसी के पहले रामजन्मभूमि मामले की सुनवाई होने वाली है। कोर्ट इस तारीख के बाद प्रतिदिन सुनवाई में मामले को लगा सकता है। आजादी के पहले से कोर्ट और कानून के पेंच में उलझा ये मसला दिन बा दिन पेचीदा होता जा रहा है। अयोध्या के हालात लगातार गरम हो रहे हैं। कभी इस मामले में सुलह को कोशिशें होती हैं तो कभी टकराव देखने को मिलते हैं। लेकिन इन सबके बीच कुछ सच हैं जिन पर ना तो नजर जाती है ना ही हम देखना चाहते हैं। किसी आंदोलन की रूपरेखा ही उसकी दिशा तय करती है। 90 के दशक में भारतीय जन मानस के पटल पर विश्व का सबसे बड़ा विवाद राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के तौर पर सामने आया था।

जहां अयोध्या हिन्दू जनमानस में सप्त पुरी का दर्जा प्राप्त के विशाल धार्मिक महत्व लिए हुए। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम की जन्म भूमि का गौरव लिए हुए है। वहीं पर यह विवादित क्षेत्र है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर की याद में उनके शासन काल में उनके सिपहसालार मीरबांकी ने एक मस्जिद तामील कराई थी। इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा गया था। हिन्दू जनमानस का कहना था कि ये मस्जिद महाराजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र की जन्म स्थिल पर एक भव्य मंदिर को ध्वस्त कर बनाई गई थी। लिहाजा ये जमीन और स्थल हिन्दुओं का है । जिसको कब्जा किया गया है, मुगलकाल से लेकर अंग्रेजी हुकूमत तक कई बार इस पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हमले होते रहे। लेकिन हर बार अयोध्या की धरती लहू के रंग से लाल होती रही।

देश की आजादी के बाद जब सोमनाथ का जीर्णोंधार हुआ तो ऱामजन्मभूमि के आवाज भी बुलंद होने लगी। अंग्रेजी कार्यकाल में जिस परिसर को घेर कर बंद कर दिया गया था, और इस पर संगीनों का पहरा लगा हुआ था। उस परिसर में 1949 में भगवान की मूर्ति का प्राकट्य हो गया। एफआईआऱ हुई, कार्रवाईयों का दौर चला चलते-चलते उस परिसर का ताला खुला। उसमें पूजा अर्चना होने लगी, लेकिन अब इस प्रकरण को लेकर देश के राजनीतिक दलों में पहले कैच करने की ओढ़ मची लेकिन तुष्टिकरण और वोट की राजनीति ने अलग-अलग खेमे बना लिए। दो समुदायों के बीच वैमनस्य का जहर घुलने लगा। फिजा की रंगत उड़ने लगी, इस प्रकरण को लेकर भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद के साथ आरएसएस मैदान में हिन्दू पक्ष की अगुवाई कर रहा था। वहीं इस प्रकरण को हवा देने वाली कांग्रेस वोटों की राजनीति में अपनी स्थित तटस्थ की बनाए बैठी थी। वहीं तत्कालीन जनता की केन्द्र वीपी सिंह और राज्य में मुलायम सिंह की सरकार ने वोटों की राजनीति के लिए एक वर्ग विशेष के पक्ष में आकर खड़ी दिखाई दी। जनता औऱ सरकार के बीच संघर्ष की स्थितियां बनी । सरकार ने जनता के आंदोलन को कुचलने के लिए अयोध्या में आजाद भारत का सबसे बड़ा नरसंहार कर डाला।

आने वाली 6 दिसम्बर को अयोध्या कांड की बरसी है लेकिन इन सबके बावजूद इस कांड में मारे गए लोगों को याद करना तो दूर अब उनके लहू पर राजनीति की बिसात बिछाई जा रही है। 2 नवम्बर 1990 में इस कांड का गवाह बना स्व. महंत कृष्ण चन्द्राचार्य का आश्रम अब अपनी जीणशीर्ण अवस्था में आ चुका है। वर्तमान में इस आश्रम की हालत खस्ता है। ना सरकारी मदद मिली ना ही किसी राजनीतिक दल ने मदद की अपना सब कुछ इस कांड में लूटा दिया इस आश्रम ने लेकिन फिर भी शान से खड़ा है। महंत जी तो अब रहे नहीं लेकिन इस सदगृहस्थ आचारी त्रेंगल परम्परा के आश्रम का संचालन गुरू माता के स्वरूप में उनकी धर्म पत्नी डॉ ओम श्री भारती कर रही है। भारत खबर की टीम ने बरसी के पहले इस कांड को लेकर और इस आंदोलन में मारे गए लोगों के बारे में जब उनसे बात करनी चाही तो उनके आंसू छल पड़े। उन्होने कहा कि बेटों को मारते देखा था। खुद भी गोली लगी थी, वो यातना के क्षण भूलाए नहीं जाते हैं। तस्वीर आंखों के सामने रहती है। कैसे मंदिर की छतों से बूटों की आवाजे आती हैं। फिर मंदिर के अंदर गोलियां चलती है। जय श्री राम के उद्घोष के साथ आवाजें धीरे-धीरे शांत होने लगती है। मंदिर में खून की होली खेल खाकी धारी खादी के पहरी चले जाते हैं। राम भक्तों की लाशों को घसीटा जाता है। बाहर निकाल कर फिर से गोली मारी जाती है। ये बस कहते कहते उनका गला रूंध गया।