क्या गुलमेहर विवाद की स्क्रिप्ट पहले से ही प्रायोजित थी ?

गुरमेहर कौर को लेकर विवाद गहराया तो कई सारे सवाल विचारों के ईर्द-गिर्द कौंधने लगे। पहला सवाल यह था कि क्या 2014 के बाद से ही छात्र प्रदर्शन की गतिविधी में बढ़ोतरी हुई है। क्या इससे पहले की सरकारों के समय में विश्वविद्यालयों में माहौल बिल्कुल शात और भला चंगा था। क्या इस सरकार के आने के बाद ही छात्रों के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उन्हे सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करना पड़ा। सवाल और भी हैं लेकिन इसका सही जवाब तब मिलता जब इसपर पूरी तरह से शोध किया जाता। शोध के तरीके आजकल बदल गए हैं। इससे पहले जेएनयू में कथित देश विरोधी नारे को लेकर जिस तरह से कन्हैया हीरो बन गया उसने सोचने पर मजबूर कर दिया। क्योंकि तब कन्हैया को अदालत जाने के क्रम में जिस वकील ने थप्पड़ मारा उसके साथ धक्का-मुक्की की उसी फोटो को राजनाथ सिंह के साथ दिखाकर विपक्षियों ने खूब हंगामा खड़ा किया। लेकिन आज गुरमेहर के साथ जो भी हुआ उसे लेकर जब जानकारी खंगाली जा रही थी तो पता चला कि इस प्रकरण में भी दाल में कुछ काला है। क्योंकि सोशल मीडिया पर गुरमेहर की फोटो आप के साथ साथ लेफ्ट के नेताओं के साथ भी नजर आई।

गुरमेहर को जो भी धमकी दी गई उसके खिलाफ वह पुलिस के पास नहीं गई वह सीधे अपनी शिकायत लेकर दिल्ली महिला आयोग के दफ्तर पहुंच गई जिसे लेकर भी कई सारे सवाल खड़े होने लगे। जबकि गुरमेहर को धमकी देनेवालों के खिलाफ दिल्ली पुलिस के पास मामला दर्ज कराने एबीवीपी के लोग पहुंचे। जबकि मामले की तह तक जाने से पहले ही सूत्रों की तरफ से जानकारी भी प्राप्त हो गई की जिसने गुरमेहर को धमकी दी वह आईसा का सदस्य है मतलब साफ निकलकर आ रहा था कि यबकुच पहले से प्रायोजित था।

गुरमेहर के बारे में पूरा देश जान गया कि वह एक शहीद की बेटी है और उसके पिता कुपवाड़ा में पाक समर्थित आतंकियों से लोहा लेते हुए मारे गए थे। तब गुरमेहर दो साल की थी। यानि उसे नहीं पता होगा की उसके पिता की हत्या पाकिस्तान ने की या युद्द ने। लेकिन 20 साल की इस लड़की ने जिस तरह से इस मुहिम की शुरुआत की वह सच में सोचने लायक है। आखिर यह भी जानने की कोशिश करना जरूरी था कि यह सब शुरू कहां से हुआ।

आगे कहां से हुई राजनीति की शुरुआत

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