खादी के उत्थान की कोशिश रही नाकाम, अब मोदी के योगदान से क्यों कांग्रेस है परेशान 

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के नए साल के कैलेंडर और डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर छपने को विपक्ष बेवजह ही तूल दे रहा है। कहा जाए तो कांग्रेस समेत विपक्षी दल इसे बेवजह ​विवाद का रंग देकर कुछ ऐसे तथ्यों से घबराए होने का संकेत दे रहे हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन कोशिशों की कामयाबी को रेखांकित करते हैं जो उन्होंने खादी को वह स्थान दिलाने के लिए की थी जिसकी वह हकदार रही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस खादी को एक नई पहचान दिलाने की मोदी की कामायाबी से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह से विवाद खड़ा कर रही है। कांग्रेस के यूपीए के शासनकाल में खादी को वह सम्मान और पहचान नहीं मिली जो मोदी ने दिला दिया। किसे नहीं पता है कि खादी न केवल भारत के कोने-कोने में लोकप्रिय हुई बल्कि विश्व की कई मुल्कों में भी इसे पूरा सम्मान मिला।

महात्मा गांधी को अपनी जागीर समझने वाली कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी क्या बताएंगे कि पार्टी की सरकार ने कभी यह कर दिखाया। कतई नहीं। सिर्फ गांधी सरनेम होने से गांधी की विरासत पर हक नहीं जमाया जा सकता है। खादी का उत्पादन बढ़ने और उसकी बिक्री बढ़ने जैसी मोदी सरकार की उपलब्धि से कांग्रेस में घबराहट तो पिछले कई महीनों से महसूस हो रही थी। लेकिन अब कैलेंडर और डायरी में चरखा कातते हुए नरेंद्र मोदी की तस्वीर पर तूफान खड़ा कर कांग्रेस ने यह साबित भी कर दिया है कि उसे मौजूदा केंद्र सरकारी की कोशिशों से खादी की लोकप्रियता बढ़ जाने से बेहद बेचैनी है। बल्कि कहा जाए तो इसका कांग्रेस सियासी नुकसान भी भांप रही है। हर पल गांधीजी की आड़ में सियासत करने वाली कांग्रेस से सवाल तो पूछ ही जा रहे हैं कि बापू की देन खादी की उपेक्षा यूपीए सरकार के वक्त क्यों होती रही। आखिर ऐसा कुछ क्यों नही हुआ जो पीएम मोदी ने कर दिखाया।

 

कई ऐसे तथ्य हैं जो साबित कर रहे हैं कि पीएम मोदी की तस्वीर चरखे के साथ छपने पर आपत्ति जताना निरर्थक है और सिर्फ सियासत के मकसद के ही किया जा रहा है। एक बात स्पष्ट है कि पहले कभी भी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के किसी सामान पर महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं छपी है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013 और 2016 के कैलेंडर और डायरी पर गांधीजी की तस्वीर नहीं थी। इन बरसों में तो कांग्रेस की भी सरकारें रही हैं। ऐसे में तो सवाल कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि उसकी सरकारों ने क्यों गांधीजी को दरकिनार किया। ऐसे में यह कहना तो एकदम बेतुका है कि मोदी की तस्वीर गांधी की जगह छाप दी गई है। दूसरी बात यह है कि मोदी की वह तस्वीर छापी गई है जो उनके महिलाओं को चरखा प्रदान करने के बाद खींची गई थी। न कि सिर्फ चरखा पर प्रर्दशन के लिहाज से बैठकर जबरदस्ती खिंचवाई गई फोटो है।

महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए करने वाली कांग्रेस को तो यह बताना चाहिए कि बापू को लेकर उसने ऐसे कौन से कार्यक्रम किए जो देशवासियों के दिलो-दिमाग में अभी तक छाया हुआ है। चरखे के पीछे सियासत करने से कांग्रेस कभी नहीं चूकी। लेकिन कभी चरखे की अहमियत को लोगों तक पहुंचाने के लिए कोई भी ठोस पहल कभी नजर नहीं आई। कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए कभी खादी और चरखा को देश में ही लोकप्रिय बनाने की कांग्रेस की को​ई कोशिश किसी को याद नहीं। दुनिया के तमाम मुल्कों को तो छोड़ ही दीजिए। इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा विश्व पटल पर खादी की चर्चा की और उसे एक ब्रांड के तौर पर स्थापित किया। एयर इंडिया के स्टाफ को खादी के वस्त्र पहनने की अनिवार्यता मोदी सरकार की उसी रणनीति का हिस्सा है जो खादी को बाहर के मुल्कों में स्थापित करने को लेकर बनाई गई है। यह निश्चित तौर पर मोदी की खादी को लेकर एक ठोस सोच को दर्शाता है जो कांग्रेस के गले शायद ही उतरेगा। आखिर बापू की अहम विरासत खादी जैसे सियासी अस्त्र के हाथ से निकल जाने के जोखिम से जो कांग्रेस रूबरू हो रही है।

 

महात्मा गांधी के स्वच्छता पर जोर को मिशन के रूप में बदल कर रख देने वाले मोदी से कांग्रेस का परेशान होना लाजिमी है। स्वच्छ भारत मिशन पर भी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने हमेशा निशाना साधकर यही साबित किया है कि पीएम मोदी के इस प्रोजेक्ट से देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी में कितनी बेचैनी है। प्रधानमंत्री बनने के बाद से जिस तरह बापू के आदर्शों को आगे बढ़ाने का काम मोदी ने किया है वह सच में इस पर सियासत करने वाले विरोधियों के लिए चिंता का सबब है। जो लोग इस विवाद को तूल दे रहे हैं, उनको समझना चाहिए कि कांग्रेस के 50 सालों में खादी की बिक्री 2 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक सीमित रही थी लेकिन पिछले 2 साल में खादी की बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है जो 34 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह सब पीएम की खादी को जन स्वीकृति दिलवाने के परिणामस्वरूप हुई है।

खास बात यह है कि खादी ग्रामोद्योग में ऐसा कोई नियम नहीं है कि कैलेंडर डायरी पर महात्मा गांधी की तस्वीर ही लगाई जाएगी। जानकारी के अनुसार नरेन्द्र मोदी की खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर लगी तस्वीर गरीब महिलाओं को चरखा वितरण कार्यक्रम की है और बापू की तस्वीर हटाकर पीएम मोदी की तस्वीर छपी है ऐसा कहना सरासर तर्कसंगत नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार बनाने के तुरंत बाद अपील की थी कि लोग खादी के इस्तेमाल को बढ़ावा दें। जिसके बाद खादी की बिक्री में वृद्धि दर्ज की गई। यही नहीं बॉलीवुड के महानायक अमिताभ ने बिना शुल्क खादी का ब्रांड एंबेसडर बनना स्वीकार कर लिया। इसके साथ हीं खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने बताया था कि दिल्ली के प्रमुख आउटलेट में खादी उत्पादों की बिक्री 60 फीसदी बढ़ी। मोदी सरकार की तरफ से खादी ग्रामोद्योग को आगे बढ़ाने के लिए 341 करोड़ रुपये की योजना को साल 2015 में मंजूरी दी गई। जबकि क्रेडिट रेटिंग के लिए 200 करोड़ रुपये का बजट भी इसके लिए रखा गया।

इधर नरेंद्र मोदी के खादी उद्योग को बढ़ावा देने की कोशिशों को जारी रखते हुए राष्ट्रीय विमानन कंपनी एयर इंडिया ने भी अब अपने कर्मचारी को खादी पहनने के निर्देश दे दिए। एयर इंडिया के चालक दल के सदस्य अब ड्यूटी के समय खादी में नजर भी आने लगे हैं। वहीं चालक दल के सभी सदस्यों को खादी की सिल्क साड़ियां, खादी की पतलून, खादी की शर्ट और जैकेट दी गई हैं। इसके अलावा फ्लाइट के दौरान दी जाने वाली अन्य आवश्यक वस्तुएं भी खादी कपड़े से ही बनी होती हैं।

इससे पहले प्रधानमंत्री का विरोध करनेवाले सपा के मुख्यमंत्री भी मोदी के खादी के प्रति लगाव की तारीफ करने से अपने आप को रोक नहीं पाए थे और उन्होंने सरकार के इस प्रयास की जमकर सराहना की थी और कहा था कि खादी से महात्मा गांधी याद आते हैं। जब से राजनीति में आया तब से खादी ही पहन रहा हूं। बदलते दौर में खादी को स्थान देना हमारी जिम्मेदारी है। इसके साथ हीं अखिलेश ने कहा था कि लैपटॉप, विद्याधन की तरह हम चरखा भी फ्री में देंगे। उन्होंने कहा था कि जमाना मार्केटिंग और ब्रांडिंग का है इसीलिए हमें भी खादी की मार्केटिंग व ब्रांडिंग करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री मोदी ने खादी को लोगों तक पहुंचाने के लिए हर संभव कोशिश की है। इसी का नतीजा है कि अब खादी के उत्पादों का उपयोग करने के लिए रेल मंत्रालय, पुलिस विभाग, भारतीय नौसेना, डाक विभाग सहित अन्य सरकारी संस्थान आगे आ रहे हैं, जो कि एक बड़ी बात है।सरकार भारत के गांव-गांव में खादी और ग्रामोद्योग का नेटवर्क तैयार करना चाहती है। जिससे लोगों के अंदर स्वदेशी अपनाने की भावना जगे और लोगों को रोजगार भी मिले। पीएम मोदी खुद खादी पहनकर इसकी ब्रांडिंग करते हैं जो कि अपने आप में एक खूबसूरत प्रयास है।पीएम मोदी खादी के जरिये भारतवासियों को स्वाबलंबी बनाने के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे हैं इसलिए नव गठित खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग नये अवसरों एवं चुनौतियों को ध्यान में रखकर कई महत्वपूर्ण पहल कर रहा है ताकि देश में अच्छे दिन आसानी से आ पायें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो एक मन्त्र भी दिया था कि आज़ादी से पहले ‘खादी फॉर नेशन’ था अब ‘खादी फ़ॉर फैशन’होना चाहिए।

शायद इसी का असर था कि खादी ने बिकवाली का नया रिकॉर्ड स्थापित किया था। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) की कनॉट प्लेस स्थित दुकान की बिक्री एक दिन में 1.08 करोड़ रुपये के करीब रही थी। एक दिन में यह सबसे अधिक बिक्री का रिकॉर्ड था। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर को लेकर इतना बड़ा हो हल्ला समझे से परे है। जबकि इन सब से अलग खादी की लोकप्रियता पर ध्यान देने की जरूरत है जो प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों का हीं नतीजा है। ऐसे में अगर मोदी सरकार खादी के विकास के लिए लगातार प्रयासरत है जिससे नए-नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे तो विपक्ष का किस बात की चिंता सताने लगती है। जो प्रधानमंत्री के खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के कैलेंडर पर उनकी तस्वीर को लेकर बवाल मचाने लगते हैं।

केवीआईसी के कर्मचारी भी मानते हैं कि तस्वीरों पर इस तरह के बदलाव ‘असामान्य बात’ नहीं हैं। अतीत में भी ऐसे बदलाव हो चुके हैं। कर्मचारियों की मानें तो ‘पूरा खादी उद्योग ही गांधीजी के दर्शन, विचार और आदर्श पर आधारित है। वह केवीआईसी की आत्मा हैं। उनकी अनदेखी करने का तो सवाल ही नहीं उठता। यही सरकार का भी कहना है। कर्मचारियों का तो यहां तक कहना है कि नरेंद्र मोदी लंबे समय से खादी पहन रहे हैं। उन्होंने खादी को आम लोगों ही नहीं, विदेशी हस्तियों के बीच भी लोकप्रिय किया है। उन्होंने खादी को पहनने की अपनी अलग स्टाइल विकसित की है। उनके अनुसार सच यह है कि वह (नरेंद्र मोदी) खादी के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर हैं।  उनकी सोच खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की सोच से मिलती है। यह सोच ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए गांवों को आत्मनिर्भर बनाने, कौशल विकास के जरिए ग्रामीण आबादी को रोजगार मुहैया कराने, खादी बुनने के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने, नई खोज करने और इसे बेचने की है। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री युवाओं की प्रेरणा भी हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की तस्वीर को लेकर हो हल्ला ठीक नहीं है।

अगर खादी का प्रचार प्रसार होगा तो लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा। अब इन आलोचकों को कौन समझाए कि आपकी इन अवांछित आलोचनाओं से लोगों को मिलने वाली प्रस्तावित रोजी-रोटी भी छीनी जा सकती है। मतलब कि अगर प्रधानमंत्री लोगों को रोजगार दिलाने के लिए कार्य करें तो आप ये क्यों कर रहें हैं? और अगर ना करें तो क्यों नहीं किया? अब ऐसे आलोचक रहें तो देश कैसे बदलेगा। ऐसे में कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को खादी के उत्थान और उसकी लोकप्रियता के लिए पीएम मोदी के योगदान को देखना और सराहना चाहिए न कि उनकी फोटो कहां छपी या नहीं छपी इस पर सियासत करनी चाहिए।

 

 

 -गंगेश ठाकुर