पितृविसर्जन पर ऐसे करें पितरों का तर्पण

नई दिल्ली। मंगलवार को सुबह 11 बजकर 52 मिनट पर पितृपक्ष की अमावस्या तिथि लग गई है। श्राद्ध के इस माह में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है। अश्विन मास की अमावस्या तिथि को हिन्दू धर्म में पितरों की शांति के लिए सबसे बेहतर महूर्त के तौर पर माना जाता है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इस माह के श्राद्ध पक्ष यानी पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों और पितरों की शांति उनके शाप और दोष से मुक्त रहने और भविष्य में इसके बुरे फलों से बचने के लिए पितृश्राद्ध करते हैं।

पितृपक्ष के हर दिन व्यक्ति अपने पितरों के मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध करता है। लेकिन किसी कारण वश अगर श्राद्ध की तिथि छूट जाए या ना कर पाये या फिर उसे मृतक की मृत्य की तिथि ज्ञात ना हो तो उसके लिए श्राद्ध अमावस्या की तिथि पर श्राद्ध करना लाभदायक होता है। इस दिन पितृदोषों से मुक्ति मिलने के साथ पितरों को व्यक्ति तर्पण कर विदा कर देता है। अगर तीन सालों तक पितरों को तर्पण ना दिया जाए तो पितृदोष लगने के साथ आपके पितर पितृ योनि से वापस प्रेत योनि में चले जाते हैं। ऐसे में किसी तीर्थस्थान पर जाकर अपने पितरों का त्रिपिण्डी श्राद्ध कराना पड़ता है।

श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि को पितृविसर्जन के तौर पर भी जाना जाता है। इस दिन श्राद्ध का पहला भोज कौए को दिया जाता है। पितर पक्ष में कौए को भोजन कराने से पितृदोष का नाश होता है। इस दिन मान्यता है कि पीपल के वृक्ष में जाकर पितरों को जल का तर्पण देना चाहिए अगर पीपल तक ना जा सकें तो नदी या जलाशय में तर्पण देना चाहिए। जब जलाशय में तर्पण दे तो हाथ में काला तिल और अक्षत जरूर होना चाहिए पितरों को जल का तर्पण करने से पितरों का आशीर्वाद हमेशा आप पर बना रहता है। इससे घर में खुशहाली और शांति आती है।

तर्पण करने के बाद पितरों के निमित्त दान और पूजन करने का संकल्प लेना चाहिए। इसके लिए यह मंत्र पढ़ते हुए संकल्प करना चाहिए, ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु नम: परमात्मने पुरुषोत्तमाय ॐ तत्सत् अद्य ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कल‍ि प्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरत खण्डे अमुक क्षेत्रे अमुक पराभव अमुकनाम अमुक संवत्सरे उत्तरायणे/ दक्षिणायने, अमुक ऋतौ, अमुक मासे,अमुक पक्षे, अमुक तिथौ, अमुक वासरे अमुक गौत्र: अहं। शास्त्रोक्त फल प्राप्ति द्वारा मम समस्त पितृ शान्त्यर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं अमुक दान निष्क्रय द्रव्यं चाहं करिष्ये।’ ॐ तत्सत्

पितरों के तर्पण और दान के संकल्प के साथ इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पण दान, ब्राह्मण भोजन और अन्नदान के साथ वस्त्र और भूमि दान किया जाता है। क्योंकि पितृपक्ष में पितरों को तर्पण और दान कर विदा करने से पितर हमेशा आपसे खुश रहते हैं और आपको आशीर्वाद देते हैं।