उत्तराखंड के स्थापना दिवस के मौके पर जानिए देवभूमि उत्तराखड़ क्यों हैं सभी राज्यों में सबसे खास….

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड आज ही के दिन साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक नए राज्य के रूप में समाने आया था। पहले इस राज्य का नाम उत्तरांचल रखा गया था., लेकिन साल 2007 में यपीए-2 ने राज्य के नाम को बदलकर इसे ‘उत्तराखंड’ नाम दे दिया। भले ही उत्तराखंड भारत के नक्शे पर साल 2000 में अस्तित्व में आया हो, लेकिन यहां की संस्कृति और यहां का खानपान भारत के एक नए इतिहास को दर्शाता है। देवभूमि उत्तराखंड पहाड़ों पर और हसिन वादियों के बीच में बसा भारत के सबसे खुबसूरत राज्यों में से एक है। इस राज्य की खुबसूरती देखते ही बनती है, जो भी यहां एक बार आता है उसे उत्तराखंड के हसिन वादियों को देखकर वापस जाने का मन ही नहीं करता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड ही वो राज्य है जहां के चार धामों की यात्रा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन चार धामों में शामिल है. केदारनाथ, बद्रिनाथ, गंगौत्री और यमनौत्री।

अगर इस पहाड़ी राज्य की संस्कृति की बात करे तो इसकी खुबसूरती की तरह इसकी संस्कृति भी बेहद खुबसूरत है। पहाड़ी राज्य होने के चलते यहां ठंड बहुत ज्यादा पड़ती है, इसलिए इसकी संस्कृति , वेशभूषा और खान-पान भी ठंड के अनुरूप ही है। जैसे की उत्तराखंड एक पहाड़ी क्षेत्र है, इसलिए यहां ठंड से बचने के लिए लोगों के पक्के मकान होते हैं और दिवारो पर अलग से पत्थरों को लगाया जाता है। यहां अधिकतर घरों में रात को रोटी और दिन में चावल खाने का प्रचलन है और यहां लगभग हर महीने कोई न कोई तीज त्योहार आते ही रहते हैं। यहां की उज्जवल संस्कृति की तरह यहां का भविष्य भी उज्जवल है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के हिसाब से यहां की साक्षरता दर कहीं ज्यादा है। वैसे तो उत्तराखंड की आधिकारिक भाषा हिंदी ही है और यहां के सारे सरकारी काम हिंदी में ही होते हैं, लेकिन इसके अलावा यहां की तीन मुख्य भाषाएं भी यहां , जिन्हे देवनागरी लिपी में लिखा जाता है।  उत्तराखंड की इन तीन भाषाओं में गढ़वाली खंड में बोली जाने वाली गढ़वाली , कुमाउँनी खंड में बोली जाने वाली कुमाउँनी और राज्य के जौनसार भाभर क्षेत्र में जौनसारी भाषा बोली जाती है।

उत्तराखंड़ का खानपान 

उत्तराखंड के खान-पान की बात करें तो यहां का खानपान यहां के दोनों मण्डलो कुमाऊँ और गढ़वाल के खानपान से है। यहां का पारम्पारिक उत्तराखड़ी खानपान बहुत पौष्टिक और बनाने में बहुत सरल होता है। यहां खाए जाने वाले  विशेष खानों में जो शामिल है वो हैं, आलू टमाटर का झोल, पीनालू की सब्जी, चैंसू, झोई, कापिलू, मंडुए की रोटी, बथुए का पराठा,बाल मिठाई, सिंसौण का साग, गौहोत की दाल आदि चीजे शामिल हैं।

उत्तराखंड की वेशभूषा 

उत्ताराखंड की वेशभूषा की बाते करें तो यहां की महिलाए घाघरा और आंगड़ी पहनती है, तो वहीं पुरुष चूड़ीदार पजामा और कर्ता पहनते है। लेकिन अब इसका स्थान महिलाओं के मामले में साड़ी ने ले लिया है। हालांकि यहां शादि समाहरों में आज भी पारंपारिक कपड़े पहनने का चलन है। इसके अलावा यहां की महिलाएं गले में गलोबन्द, चरयो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफुल और कुण्डल पहनने की परंपरा है। सिर में शीषफूल, हाथों में सोने या चाँदी के पौंजी तथा पैरों में बिछुए, पायजब, पौंटा पहने जाते हैं। घर परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परम्परा है। विवाहित औरत की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का भी यहाँ चलन आम है। यहां अलग-अलग मौके पर अलग-अलग लोक नृत्य प्रचलित हैं, जिनमें  विशुद्ध देवी-देवताओं का नृत्य, देवता के रूप में पाण्डवों का पण्डौं नृत्य, मृत आशान्त आत्मा नृत्य, रणभूत देवता नृत्य आदि शामिल हैं।

उत्तराखंड की लोक कलाएं

लोक कला की दृष्टि से उत्तराखण्ड बहुत समृद्ध है। घर की सजावट में ही लोक कला सबसे पहले देखने को मिलती है। दशहरा, दीपावली, नामकरण, जनेऊ आदि शुभ अवसरों पर महिलाएँ घर में ऐंपण बनाती है। इसके लिए घर, ऑंगन या सीढ़ियों को गेरू से लीपा जाता है।उत्तराखण्ड की लोक धुनें भी अन्य प्रदेशों से भिन्न है। यहाँ के बाद्य यन्त्रों में नगाड़ा, ढोल, दमुआ, रणसिंग, भेरी, हुड़का, बीन, डौंरा, कुरूली, अलगाजा प्रमुख है। यहाँ के लोक गीतों में न्योली, जोड़, झोड़ा, छपेली, बैर व फाग प्रमुख होते हैं। इन गीतों की रचना आम जनता द्वारा की जाती है। इसलिए इनका कोई एक लेखक नहीं होता है। यहां प्रचलित लोक कथाएँ भी स्थानीय परिवेश पर आधारित है। लोक कथाओं में लोक विश्वासों का चित्रण, लोक जीवन के दुःख दर्द का समावेश होता है।