…बुलंदशहर से जुड़े सवालों के जबाव चाहिए !

उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में नेशनल हाइवे पर गैंगरेप का बेहद ही शर्मनाक मामला सामने आया है। कार में सवार परिवार को बंधक बनाकर वहशी दरिंदो ने मां और बेटी को हवश का शिकार बनाया है। सामूहिक दुष्कर्म की यह खौफनाक घटना कानून के शासन को कलंकित करने और सभ्य समाज को लज्जित करने वाली हैं। रूह को कंपा देने वाली इस घटना ने एक बार फिर नारी अस्मिता को कुचला है। एक बार फिर नारी की इज्जत को तार-तार किया गया।

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उस डरावनी एवं खौफनाक रात्रि की कल्पना ही सिहरन पैदा करती है कि परिवार के सदस्यों के सामने किस तरह एक मां-बेटी को अगवा किया और फिर बंधक बनाकर गैंगरेप किया गया। रोंगटे खड़े करने वाली यह घटना जंगलराज नहीं, बल्कि बर्बर-क्रूर जंगलराज जैसे अमानवीय हालात को बयान करती है। ऐसी घटनाओं से कानून और व्यवस्था पर भरोसा डिगने के साथ ही शासन-प्रशासन की नाकामी भी सामने आयी है। उत्तरप्रदेश सरकार जहां अपने प्रचार में महिला सुरक्षा की बात करती है, नारी को सम्मानित जीवन देने के बड़े-बड़े विज्ञापन करती है, वहीं यह घटना उनकी पोल खोल रही है। इस सरकार में न तो अपराधी डरते हैं, न ही पुलिस उन पर कोई कार्रवाई कर पाती है।

सामूहिक दुष्कर्म की वह काली रात एक ऐसा वीभत्स एवं डरावना पृष्ठ है जिसमें मां-बेटी कितनी चीखी-चिल्लाई होगी, कितनी बार उसने दरिन्दों से रहम की भीख मांगी होगी, कितना उसने दरिन्दों से मुकाबला किया होगा, सोच कर ही कंपकंपी होती है और इस पूरे घटनाक्रम पर पूरा देश सदमें में है। गैंग रेप की इस घटना के बाद का हर पल देश के सवा अरब जनमानस को व्यथा और शर्मिंदगी के सागर में डुबो रहा।

हमने निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड को देखा और समूचे राष्ट्र ने उस समय जो जागरूकता दिखाई, जो संवेदनाएं व्यक्त की, जिस तरह घरों से बाहर आकर ऐसे जुल्म के खिलाफ सामूहिकता का जो प्रदर्शन किया, उसी का परिणाम था कि दिल्ली की फास्ट टैªक अदालत ने चारों आरोपियों को फांसी की सजा सुनायी। अदालत का वह फैसला केवल फैसला नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी परिभाषा समेटे हुए था अपने भीतर। जिससे एक रोशनी आती है कि अब नारी की इस तरह सरेआम अस्मत से खिलवाड़ करने वालों को हजार बार सोचना होगा। सचमुच इस अदालती फैसले ने एक नया सूरज उदित किया था। पुरुष की पशुता पर नियंत्रण की दृष्टि से एक सफल उपक्रम हुआ था। लेकिन बुलन्दशहर की इस घटना एक बार फिर पूरी मानवता को झकझोर दिया है।

चाहे भंवरीदेवी हो, या प्रिदर्शिनी मट्टू या फिर नैना साहनी- या निर्भया -आज का मनुष्य अपनी सुविधानुसार नारी को भोग्या बनाये हुए है। यह मनुष्यता का घोर अपमान है। पुरुष की वासना कीमती, नारी सस्ती- कैसी विडम्बना! मनुष्य सस्ता, मनुष्यता सस्ती- कैसी त्रासदी!! और मनुष्य अपमानित नहीं महसूस कर रहा है। जीवन मूल्यहीन और दिशाहीन हो रहा है । हमारी सोच जड़ हो रही है। वासना और कामुकता के चक्रव्यूह में जीवन मानो कैद हो गया है। चारों ओर घोर अंधेरा- सुबह का निकला शाम को घर पहुंचेगा या नहीं-आश्वस्त नहीं है मनुष्य। अगर पत्नी पीहर गई है, तो अपनी जवान लड़की को पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर आप दफ्तर नहीं जा सकते। जवान लड़कियों का दिन हो या रात्रि में बाहर निकलना असुरक्षित होता जा रहा है। क्या यह काफी नहीं है हमें झकझोरने के लिए? पर कौन छुएगा इन जीवन मूल्यों को? कौन मंथन करेगा इस विष और विषमता को निकालने के लिए। निर्भया ने इस वहशीपन पर जागरूकता का वातावरण निर्मित किया। उस समय जिन-जिन ने संघर्ष किया, उन को नमन। क्योंकि वह लाखों-लाखों युवाओं के बलिदान और संघर्ष का ही परिणाम था कि सरकार भी झूकी, कानून भी सक्रिय हुआ और मीडिया भी एक नये तेवर में दिखाई दिया। लेकिन क्या बुलन्दशहर में मां-बेटी को नौंचे जाने की घटना भी ऐसी ही किसी क्रांति का सबब बनेगी?

निर्भया के बाद कानून बना, लेकिन ताजा घटना ने यह जाहिर किया है कि असल में सख्त कानून अपराध के खात्मे का परिचायक नहीं होते हैं। फिर हम क्यों इन कानूनों के बन जाने का आदर्श स्थिति मानकर चल रहे हैं कि अब अपराध और अपराधियों की खैर नहीं। हत्या जैसे अपराध ऐसे हैं जिनके लिए सुपरिभाषित और सुस्पष्ट सख्त कानून हमारे विधान में मौजूद हैं, लेकिन क्या हत्या जैसे वे तमाम अपराध खत्म हो गए हैं। अगर नहीं तो क्या इस बात की पड़ताल जरूरी नहीं है? सख्त कानून किसी भी अपराध को कम तो कर सकते हैं लेकिन खत्म नहीं क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में कानून केवल एक पहलू है। इसे अमल में लाने वाले अभियोजन-पुलिस तंत्र और सामाजिक ताने-बाने की स्थिति भी अपराधों के समूल खात्में में प्रभावी भूमिका निभाते हैं।

बुलन्दशहर की घटना ने अनेक सवाल खड़े किये हैं। उत्तर प्रदेश सरकार को सवाल का जवाब देना ही होगा कि ऐसा बर्बर आपराधिक गिरोह राष्ट्रीय राजमार्ग पर क्यों सक्रिय था? पुलिस के मुताबिक यह किसी घुमंतू गिरोह द्वारा अंजाम दी गई वारदात है। यदि ऐसा है घुमंतू गिरोह पुलिस और कानून व्यवस्था के होते हुए क्यों पनपा? आज के युग में ऐसे घुमंतू गिरोहों का तो कोई अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए जो भेड़ियों के झुंड में तब्दील हो गए हों। सवाल यह है कि ऐसे किसी गिरोह पर पहले ही लगाम क्यों नहीं कसी जा सकी? वे इतने दुस्साहसी कैसे हो गए कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर इस तरह की वहशी वारदात को अंजाम दे सकें? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस घटना पर गंभीरता प्रदर्शित करते हुए त्वरित कार्रवाई की। यदि मीडिया इस घटना को प्रकाश में नहीं लाती तो शायद यह उसी काली अंधेरी रात में ही लुप्त हो गयी होती। बुलंदशहर की घटना को लेकर विरोधी राजनीतिक दलों के तीखे तेवर स्वाभाविक है, लेकिन ऐसी घटनाएं भविष्य में कहीं पर भी न हों, इसके लिए सभी दलों को कानून एवं व्यवस्था दुरुस्त करने के मामले में दलगत हितों से ऊपर उठकर विचार करने की जरूरत है। विचार ही नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई होनी चाहिए जो एक खौफ पैदा करे और लोगों को यौन क्रूरता करने से पहले उनकी मानसिकता बदलने के लिए एक सिहरन जरूर पैदा करे। ऐसी कठोर कार्रवाई की अपेक्षा है जो समाज की मानसिकता बदलने में सहायक सिद्ध हो।

उत्तर प्रदेश के बारे में अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि यहां कानून व्यवस्था डांवाडोल है। अपराधों को पनपाने में सत्ता और राजनीति का खुला प्रोत्साहन मिलता है। यही कारण है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, गैंगरेप के मामले में उत्तर प्रदेश देश में अव्वल है। यहां 2014 में सबसे ज्यादा 762 गैंगरेप हुए थे। इतना सब होने पर भी इस प्रदेश में नारी सुरक्षा एवं आम-जनजीवन के मसले कभी गंभीर शक्ल नहीं ले पाये हैं। जरूरत है समस्याओं से लड़ने के लिए सोची-समझी रणनीति, सधा हुआ होमवर्क और खूब सारा धैर्य, तभी हम कोई बड़ा परिवर्तन कर पाएंगे। बुलन्दशहर की घटना के मामले में हमने भावुकता नहीं, संवेदनशीलता दिखानी होगी, तभी आजीवन शोषण, दमन और अपमान की शिकार रही भारतीय नारी को एक उजली जगह मिलेगी। नारी अनादि काल से अत्यंत विवशता और निरीहता से देख रही है वह यह अपमान, यह अनादर। उसके उपेक्षित एक पक्ष से हमारी इस चुप्पी का टूटना जरूरी है और ऐसा होना निश्चित ही एक सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बनेगा। जरूरत इस बात की भी है कि देश और समाज में उसका जो स्थान है, वह पूरी गरिमा के साथ सुरक्षित रहे और वह खण्ड-खण्ड होकर बार-बार न बिखरे।

Lalit Garg  (ललित गर्ग, स्वतंत्र पत्रकार,  9811051133)