…नर्मदा जल, जंगल, जमीन हक सत्याग्रह

इंदौर। नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के प्रभावितों को उनका हक दिलाने के लिए शुक्रवार को इंदौर के रेलवे स्टेशन से नर्मदा बचाओ आंदोलन की ‘रैली फॉर द वैली’ शुरू हुई। वहीं शनिवार से बड़वानी के राजघाट में ‘नर्मदा जल, जंगल, जमीन हक सत्याग्रह’ शुरू हो रहा है।

Medha

इंदौर के रेलवे स्टेशन पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर की मौजूदगी में विभिन्न संगठनों से जुड़े लोग ‘रैली फॉर द वैली’ में शामिल हुए। इस रैली में 15 राज्यों के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। संवाददाताओं से चर्चा करते हुए मेजर जनरल (रिटा) एवं जल विशेषज्ञ सुधीर वोंबटकेरे ने कहा कि लंबे समय तक चलने वाले जन आंदोलन वैधानिक, सरकारी और नौकरशाही के समर्थन से वंचित किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि सिंचाई और पेयजल लाभों के दावे भी खोखले साबित हुए हैं। नहरों का काम पिछले 30 सालों में मात्र 30-35 प्रतिशत हो पाया है। कार्पोरेट और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध करवाने का सरकारी पैमाना बदलता रहा है। यह जाहिर है कि दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे के तहत आने वाले उद्योगों को पानी देने के लिए गुजरात सरकार सरदार सरोवर के कुल कमांड क्षेत्र में से चार लाख हेक्टेयर कम करने का निर्णय ले चुकी है। गुजरात सरकार के इस निर्णय के प्रथम लाभांवितों में अडाणी-अंबानी भी शामिल हैं।

उन्होंने आगे कहा कि गुजरात सरकार द्वारा सरदार सरोवर की नहर से 30 लाख लीटर प्रतिदिन कोका कोला को और 60 लाख लीटर प्रतिदिन आणंद स्थित कार कंपनी को दिए जाने का अनुबंध किए जाने से स्पष्ट होता है कि सरदार सरोवर के असली लाभार्थी कौन हैं। गुजरात के आरटीआई कार्यकर्ता भारत सिंह झाला ने कहा, “बताया गया कि गुजरात के सारे गांवों को सिंचाई मिलेगी, लेकिन हमने देखा है नर्मदा का पानी किसानों के पहले उद्योगपतियों को दिया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि संभव है, पानी कच्छ तक भी पहुंच जाए लेकिन ये किसानों और आदिवासियों के लिए नहीं, बल्कि उद्योगों के लिए होगा। उन्होंने आगे कहा कि अब यह अधिकृत रूप से स्वीकार किया जा चुका है कि सरदार सरोवर परियोजना की लागत चार हजार 200 करोड़ रुपये से बढ़कर 90 हजार करोड़ रुपये हो चुकी है यानी लागत में 21 गुना वृद्धि। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को बिजली में उनका उचित हिस्सा नहीं दिया जा रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि पुनर्वास प्रक्रिया में किए गए भ्रष्टाचार की जांच के लिए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा जस्टिस श्रवण शंकर झा की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया था। सात वर्षों की जांच के बाद प्रस्तुत आयोग की रिपोर्ट से पता चलेगा कि कितने लोगों को फर्जी रजिस्ट्री के माध्यम से खेती की जमीन से वंचित कर दिया गया है, पुनर्वास स्थल निर्माण में कितना और किस तरह से भ्रष्टाचार किया गया है, इस भ्रष्टाचार में कौन अधिकारी और दलाल शामिल रहे हैं।

कर्नाटक के पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष एवं निर्दलीय विधायक बीआर पाटील ने कहा कि सरकार अपने साधनों का इस्तेमाल करते हुए जानबूझकर मुद्दों को गलत तरीके से प्रदर्शित करती है। झा आयोग की रिपोर्ट पर विधानसभा में बहस होनी चाहिए। इस पर सार्वजनिक बहस भी जरूरी है। सरकार ऐसा न करके अनियमितता को छिपाना चाहती है। जनता को चारी, भ्रष्टाचार और बांधों के दर्द के बारे जानना चाहिए।

आंदोलनकारियों ने कहा कि राजघाट में 30 जुलाई से सत्याग्रह बगैर पुनर्वास के सरदार सरोवर के गेट बंद नहीं करने, खेती की जमीन देकर पुनर्वास करने, आवश्यक सुविधायुक्त पुनर्वास स्थलों का निर्माण करने, पुनर्वास स्थलों पर आजीविका के साधन उपलब्ध कराना आदि है। सत्याग्रह से पहले रैली फॉर द वैली में हिस्सा लेने कर्नाटक, केरल, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तरांचल, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली समेत देश के 15 राज्यों के करीब 300 समर्थक इंदौर पहुंचे।

इनमें भूमि अधिकार आंदोलन (कर्नाटक) के बिजु कृष्णन, गांधी शांति प्रतिष्ठान के कुमार प्रशांत, पूर्व विधायक एवं किसान संघर्ष समिति के डॉ. सुनीलम, माटू जन संगठन (उत्तराखंड) के विमल भाई, एनएपीएम राजस्थान के कैलाश मीणा, वरिष्ठ ट्रेड यूनियन लीडर डी.के. प्रजापति आदि प्रमुख हैं।