किसान, कर्ज, आंदोलन फिर सियासत, जाने किसान आंदोलन की इनसाइड स्टोरी पार्ट टू

नई दिल्ली। देश में बीते दिनों उठी किसान आंदोलन की आग अब सियासत का बड़ा दंगल और दांव बनती जा रही है। 1 जून को महाराष्ट्र से उठी किसानों की आग मध्यप्रदेश तक जा पहुंची किसी को पता नहीं था ये आग एक शोला बन जायेगी। आखिरकार इस आग की लपट में पूरा मध्यप्रदेश जल उठा। आंदोलन इतना उग्र हुआ कि पुलिस को गोलियां चलानी तक पड़ गई।

आखिर ये कैसा लोकतंत्र था। जहां रक्षक भक्षक बन गये। 4 किसानों की मौत हो गई । आंदोलन की आग और धधक उठी। सूबे से कलेकर केन्द्र तक सिंघासन हिल गये। विपक्ष के लिए ये तो इस राजनीति के अखाड़े में सबसे प्यारा दांव था। विपक्ष ने तुरंत ही अपना मोर्चा खोल दिया। एक तरफ आंदोलित किसान तो दूसरी तरफ विपक्ष आखिर सरकार करे भी तो क्या ना आंदोलन खत्म हो रहा है। ना ही विपक्ष के सवाल। जिनकी जाने गई उनके घरों में मातम था। तो दूसरों के पास भी कोई खुशी ना थी। जो इस आंदोलन की भेंढ चढे उनके लिए इसका दर्द कम ना हुआ था।

आंदोलन और राजनीति
सरकार के खिलाफ किसानों का ये आंदोलन धीरे-धीरे अब अपने राजनीतिक माहौल में आ गया है। विपक्ष इसके सकारात्मक हल के बजाया सरकार को गिराने और गैर जरूरी मांगों को लेकर किसानों को लामबंद करने में लगा है। सूबे में भाजपा की सरकार है तो केन्द्र में भाजपा गठबंधन की यानी दोनों जगह सरकारे एक ही है। तो विपक्ष को ठीक राष्ट्रपति चुनाव के पहले एक बड़ा मुद्दा मिल गया था। रूठे साथियों को मनाने का जिससे अपनी ताकत आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष दिखा सके। खैर ये तो सोचने और कहने की बात हुई। इस पूरे घटना के बाद सबसे पहले राहुल गांधी मंदसौर का दौरा करना चाहते थे। राहुल पहली बार किसी आंदोलन की विवादित जगह पर नहीं जा रहे थे। इसके पहले उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार के दौरान परसौल भी वो गये थे। सहारनपुर में भी राहुल ने जाने की हाल के दिनों में कोशिशें की थीं। लेकिन अब कोशिश ही नहीं राहुल को लग रहा है कि ये आग लम्बे समय तक राजनीति में कारगर सिद्ध हो सकती है। तो कांग्रेस की पूरी टीम ही मध्यप्रदेश लगा दी। लेकिन राहुल को प्रशासन ने जाने की अनुमति नहीं दी। आखिरकार राहुल को गिरफ्तार होकर वापस जाना ही पड़ा। राहुल तो चले गये लेकिन अपनी कमान सिधिंया को सौप गये।

आंदोलन और अनशन
किसान आंदोलन पर और मुख्यमंत्री आंदोलन खत्म कराने के लिए अनशन पर गजब का ड्रामा है। भाई हो भी क्यूं का मामला आंदोलन का ही नहीं कुर्सी का है। चुनाव भी होने है ऐसे में अगर ये आग शांत ना हुई तो कुर्सी का जाना तो तय हैं। लेकिन किसान तो ऐसे अड़े कि गोली खाकर भी ना माने। विपक्ष भी खर्चा पानी लेकर जुट गया। तो आखिरकार सीएम साहब की जब कुछ ना चली तो वो भी आंदोलन की राह पर जा टिके । अनशन पर शिवराज आखिर सरकार ही जब अनशन पर होगी तो आप किससे खिलाफ आंदोलन करो गये। एक दिन का ड्रामा खत्म हुआ। कहा गया मृतक किसानों के परिजनों के अनुरोध पर शिवराज ने अनशन तोड़ दिया है। लेकिन शिवराज के अनशन का जबाब विपक्ष ने सत्याग्रह से दे दिया। कहा गया कि शिवराज ने ज्योतिर्दित्य सिंधिया के सत्याग्रह के चलते अनशन तोड़ दिया। अब कल से फिर ज्योतिर्दित्य सिंधिया सत्याग्रह करेंगे।

मौके पर चौका मारने आप से लेकर हार्दिक तक आ पहुंचे
मौका था आंदोलन का वो भी भाजपा के खिलाफ तो चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत साबित करने के लिए खुद एक दूसरे को गारियाने वाले एक साथ हो लिए पहले कांग्रेस फिर आप और अब हार्दिक ने भी जमकर मंदसौर जाने का ड्रामाो किया। मीडिया में जमकर फुटेज खाई। किसानों की चिता पर राजनीति इस देश को कहां लेकर आ गई है। किसी की मौत का ये तमाशा शायद ये देश कई बार देख चुका है। लेकिन अब कल फिर नया मंच होगा और अब तमाशा पार्ट टू सिंधिया की तरफ से जारी किया जायेगा।

देश का अन्नदाता कर्ज और मौसम की मार से मरता है। सरकार के खिलाफ बड़े किसान आंदोलन खड़ा कर छोटों की आड़ में बड़ा कर्ज माफ करने के लिए खड़े रहते हैं। सरकार हर बार ये कर्ज माफ करती है। लेकिन किसानों का कर्ज ना हुआ हनुमान जी की पूंछ हो गया है। जो कि खत्म ही नहीं होता। आखिर सरकार पैसा लाये कहां ये। पहले तो टैक्स लोग देते नहीं। फिर कालाधन दबाकर सरकार को चूना लगाते है। फिर आंदोलन कर करोडों की जानमाल का नुकसान करते हैं। आखिर इनका कर्ज माफ सरकार किसके पैसे से करे आंदोलन तो ठीक पर कर्ज कैसा माफ होगा बड़ा सवाल है।

अजस्र पीयूष