अयोध्या का कनक भवन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है

अयोध्या। कल कल बहती सरयू की ये सौम्य धारा बरबस इस नगरी की तरफ लोगों को खींचती है । वैसे तो ये नगरी सदीयों ये धर्म आस्था की केन्द्र बिन्दु रही है… परन्तु इस के साथ ये नगरी दर्शनिकों इतिहासकारों के लिये भी प्रेरणा की स्रोत व कर्म भूमि रही है। हिन्दूओं के प्रथम पुरूष महाराज मनु द्वारा बसाई गई उनकी राजधानी के रूप में विख्यात अयोध्या नगरी उनके 53 वें वंशज विष्णु के अवतार श्री राम की जन्मभूमि के रूप में सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है ।

इस नगरी की पवित्रता इस बात से ही प्रकट होती है कि वर्षभर दूसरों के पाप धोने वाले तीर्थराज प्रयाग भी प्रत्येक वर्ष रामनवमी के दिन यहाँ आकर स्नान कर अपने पूर्व शरीर को प्राप्त करते हैं। रामनगरी की महिमा और इसके अतीत का बखान यहाँ के मंदिरों के शिखर बुर्जे करते हैं यूँ तो इस नगरी में करीब 10000 मंदिर हैं लेकिन हर मंदिर का अपना इतिहास और अपनी कहानी है ।आईये। हमारे साथ रामनगरी के मंदिरों के दर्शन कर जीवन धन्य करते हैं ।

दूर से ही राजस्थानी और बुन्देलखंडी वास्तुकला कला की अनुपम छटा लिये कनक बिहारी बिहारणीं जू का ये मंदिर महल जैसा प्रतीत होता है। यह मंदिर सीता और राम के सोने मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है। इसी कारण बहुत बार इस मंदिर को सोने का घर भी कहा जाता है। आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार करवाकर सीताराम के युगल विग्रहोंको वहां पुन:प्रतिष्ठित किया था।

महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाया गया विशाल कनक भवन एक हजार वर्ष तक ज्यों का त्यों बना रहा। बीच-बीच में उसकी मरम्मत होती रही। इसके जीर्णोद्धार की दूसरी सहस्त्राब्दि में अयोध्या पर अनेक बार यवनों का आक्रमण हुआ, जिसमें लगभग सभी प्रमुख देव स्थान क्षतिग्रस्त हुए। कनक भवन भी तोडा गया। इस भवन को व्यवस्थित रूप से बनवाने का श्रेय ओरछे की रानी वृषभानुकुंवरि को जाता है। यह मंदिर रानी ने 1891 में बनवाया था।ओरछे के महाराज सवाई महेंद्र प्रताप सिंह जूदेव की धर्मपत्नी महारानी वृषभानुकुं वरि जी भगवान श्री राम की अनन्य भक्त थीं।

उन्होंने कनक भवन में सीता-राम विग्रह की पूर्ण विधि-विधान से प्रतिष्ठा कराई। दिव्य युगल सरकार मान्यता है कि कनक भवन में दाहिनी ओर स्थित छोटे दिव्य मनोहर युगल सरकार त्रेतायुगके हैं। विक्रमादित्य ने इनको ही पुन:प्रतिष्ठित किया था। इनकी बाईओर जो परम सुंदर कनक भवन विहारी-विहारिणी जू हैं, उन्हें महारानी वृषभानुकुंवरि ने प्रतिष्ठित किया है। कथा है कि त्रेता युग में मिथिला में महाराज जनक की सभा में जब श्रीराम ने भगवान शंकर के धनुष को भंग कर दिया, तब जानकी ने उनके गले में जयमाल डाल दी। उस रात्रि प्रभु यह विचार करने लगे कि जनकनंदिनी वैदेही अब हमारी अयोध्या जाएंगी। इसलिए उनके लिए वहां अति सुंदर भवन होना चाहिए।

जिस क्षण भगवान के मन में यह कामना उठी, उसी क्षण अयोध्या में महारानी कैकेयी को स्वप्न में साकेत धाम वाला दिव्य कनक भवन दिखाई पड़ा। महारानी कैकेयी ने महाराजा दशरथ से स्वप्न में दिखे कनक भवन की प्रतिकृति अयोध्या में बनाने की इच्छा व्यक्त की। दशरथ जी के आग्रह पर शिल्पी विश्वकर्मा कनक भवन बनाने के लिए अयोध्या आए। उन्होंने अति सुंदर कनकभवन बना दिया। माता कैकेयी ने वह भवन अपनी बहू सीता को मुंह-दिखाई में दे दिया। विवाह के बाद राम-सीता इसी भवन में रहने लगे। इसमें असंख्य दुर्लभ रत्न जड़े हुए थे।

माना जाता है कि बाद के काल में यह भवन वीरान हो गया। द्वापर युग में श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी सहित जब अयोध्या आए, तब तक कनक भवन टूट-फूट कर एक ऊंचा टीला बन चुका था। भगवान श्रीकृष्ण ने उस टीले पर परम आनंद का अनुभव किया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि इसी स्थान पर कनक भवन अवस्थित था। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योग-बल द्वारा उस टीले से श्रीसीताराम के प्राचीन विग्रहों को प्राप्त कर वहां स्थापित कर दिया। दोनों विग्रह अनुपम और विलक्षण है। इनका दर्शन करते ही लोग मंत्रमुग्ध होकर अपनी सुध-बुध भूल जाते है। वास्तव में कनक भवन सीता-राम का अन्त:पुर है।

अजस्रपीयूष