जयंती: स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को कराया भारत के गौरवपूर्ण इतिहास से परिचित

नई दिल्ली। भारत को सांप और सपेरों का देश समझने वाले विदेशियों के मुंह पर अपने एक भाषण से ताला लगाने वाले और पुरी दुनिया में भारत का गौरव बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है, जिसे अब भारत में युवा दिवस के रुप में मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी छोटी से जीवन काल में आध्यात्म के जरिए जो ज्ञान लोगों तक पहुंचाया वो आज भी हमारे देश की युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए व्याप्त है। विवेकानंद को दुनिया में महान हिंदू सन्यासी के रूप में भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को विवेकानंद जी का अध्यात्मिक जन्म स्थान माना जाता है।

नरेंद्र नाथ दत्त के नाम से कलकत्ता में जन्मे विवेकानंद को को स्वामी विवेकानंद नाम उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने दिया था। स्वामी जी ने आध्यात्मिक ज्ञान की खोज और वेदांत दर्शन का संदेश फैलाने के लिए  शिकागो से कोलंबो और हिमालय से कन्याकुमारी तक की यात्रा की, लेकिन अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने सबसे ज्यादा समय रायपुर में ही बिताया। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में हुआ था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाईकोर्ट में वकील थे जबकि माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं।

स्वामी जी से संबंधित लेखों और दस्तावेजों से पता चलता है कि उनके पिता ने उन्हें मौसम में बदलाव के लिए रायपुर लेकर आए थे और कानूनी मुकदमे के सिलसिले में भी रायपुर में लंबे समय तक रहने की जरूरत थी। रामकृष्ण मिशन-विवेकानंद आश्रम, रायपुर के सचिव स्वामी सत्यरुपानंद कहते हैं कि वे बुधपारा में एक घर में रहे। रायपुर आने से पहले नरेन कोलकाता के ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, लेकिन उस समय रायपुर में कोई अच्छे स्कूल नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने पिता के साथ अपना समय बिताया और आध्यात्मिक विषयों पर बौद्धिक चर्चाएं कीं।

ऐसा कहा जा सकता है कि रायपुर ने स्वामी जी के आध्यात्मिक जीवन को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वामीजी ने बाद में अपनी यात्रा जबलपुर से रायपुर के दौरान अपने अनुभव को बताया।  इस घटना को युवा नरेन के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। स्वामी सत्यारुपानन्द कहते हैं कि “बैलगाड़ी की इस यात्रा के दौरान स्वामीजी को भगवान के अस्तित्व का सवाल मन में आया था।  इस दौरान बुद्ध तालाब के सामने बुधपारा में वे रुके थे, ये एक बंगाली बहुल इलाका था, जहां दिन में बौद्धिक लोग उनके घरों में होते थे।  बुद्ध तालाब को अब विवेकानंद सरोवर कहते हैं। नरेन अपने दोस्तों के साथ बुद्ध तालाब में तैराकी के लिए जाते थे इसलिए बुधपारा के निवासी ने अभी भी इसे पवित्र मानते हुए यहां रहना गर्व की बात समझते है।

रिकॉर्ड बताते हैं कि रायपुर में विश्वनाथ दत्त के यहां कई प्रसिद्ध विद्वानों आया करते थे। नरेन उनके विचार-विमर्शों को सुनते थे और कभी-कभी अपने व्यक्तिगत विचारों को उनके सामने रखते थे।  विभिन्न मुद्दों पर अपने तर्कसंगत विचारों से लोगों को चकित कर देते थे। 1879 में वह सपरिवार कोलकाता लौट आए और उसी साल उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता के लिए प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और बाद में  जनरल असेंबली इंस्टिटूशन  में शिफ्ट हो गए। रायपुर में आध्यात्मिक यात्रा के अंकुरित होने के बीज ने विवेकानंद को एक विशाल वैश्विक व्यक्तित्व के रुप में स्थापित किया।  उन्होंने शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व किया था।