जगन्नाथ रथ यात्रा कल से शुरु

नई दिल्ली। भगवान जगन्नाथ को कही कृष्ण तो कही पदभनाभ स्वामी के रुप में कही रंगनाथ स्वामी के रुप में पूजे जाते हैं। इन सभी देवताओं के आधार लक्ष्मी पति विष्णु ही हैं। ओड़िसा के पुरी में स्थित है श्री जगन्नाथ मंदिर जिसे लोग भगवान श्रीकृष्ण के रुप को मानते हैं।

जगन्नाथ शब्द का अर्थ है कि पुरे जगत के स्वामी, इस प्राचीन मंदिर का निर्माण 10वी शताब्दी में हुआ यह प्राचीन मंदिर सप्त पुरियों मे से एक है इसलिए यह नगरी पुरी या जगन्नाथपुरी नाम से प्रसिध्द हुआ। पुरी को हिन्दुओं के चारो धामों मे से एक गिना जाता है। जो भगवान बिष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है।
इस मंदिर का वार्षिक रथ यात्रा हर वर्ष निकाले जाते है। जो कि पुरे विश्व में प्रसिध्द है। जिसे लोग जगन्नाथपुरी रथ यात्रा के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। इस स्थान पर अनगिनत भक्त शांति की खोज मे आते रहते है। भगवान जगन्नाथ मंदिर मे बजती घंटीया और 65 फीट ऊंची अध्दभुद पिरामिड संरचना और हर एक जानकारी से खुदी उत्कीर्ण दीवारें जो भगवान श्रीकृष्ण के जीवन को चित्रित करती है।

जगन्नाथ मंदीर के आश्चर्यजनक तथ्य
पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको हमेशा ही आपके सामने लगा है ऐसा दिखेगा।
सामान्य दिन में हवा हमेशा समुद्र से जमीन के तरफ जाती है लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।
मंदीर के उपर लगा ध्वज हमेशा हवा के विपरीत में लहराता है।
गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।
मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक पर एक करके रख दिए जाते है। सबसे पहले सबसे उपर वाले बर्तन की प्रसाद पकता है फिर उसके निचे के बारी-बारी से पकते रहते है।
एक पुजारी मंदीर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है क्यूकि ऐसी मान्यता है कि अगर एक भी दिन झंडा नही बदला गया तो मंदिर 18 वर्षो

जगन्नाथ जी की रथ यात्रा

उड़ीसा के पूरी में स्थित जगन्नाथ जी का मंदिर समस्त दुनिया में प्रसिद्ध हैं। यह मन्दिर हिन्दुओं के चारों धाम के तीर्थ में से एक हैं। इस जगह का एक मुख्य आकर्षण जगन्नाथ पूरी की रथ यात्रा हैं। भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के भी आकर्षण का केंद्र है।

जगन्नाथ जी का रथ गरुड़ध्वज कहलाता हैं 16 पहियों वाला रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता हैं जिसमें लाल व पीले रंग के कपड़े का इस्तेमाल होता हैं विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी हिफाजत करता हैं रथ पर जो ध्वज हैं उसे त्रैलोक्यमोहनी कहते हैं।

बलराम का रथ तलध्वज के बतौर पहचाना जाता हैं जो 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता हैं यह लाल व पीले रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों सेबना होता हैं। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनामा इसके अश्व हैं। जिस रस्से से रथ खीचा जाता हैं, वह बासुकी कहलाता हैं।

प्रत्येक वर्ष अषाढ़ मास में शुक्ल द्वीतिया को जगन्नाथ की रथयात्रा होती हैं यह एक बड़ा समारोह हैं जिसमें भारत के विभिन्न भागों से श्रदा्धालु आकर सहभागी बनते हैं। दस दिन तक मनाए जाने वाले इस पर्व/यात्रा को गुण्डीय यात्रा भी कहा जाता हैं।