भारत का चीन को करारा जवाब, ब्रह्मपुत्र नदी पर बना भारत का सबसे लंबा पुल

नई दिल्ली। भारत और चीन दोनों ही ऐसे देश हैं जो एक दूसरे को ध्यान में रखकर ऐसे कई सामरिक महत्व का निर्माण करते रहते हैं। भारत और चीन को एशिया की दो महाशक्तियां माना जाता है। भारत के साथ-साथ और भी पड़ोसी देश जैसे- पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यामार और श्रीलंका चीन अपने सामरिक ठिकाने बना रहा है। जहां एक तरफ चीन भारत में अपनी सामरिक महत्व बनाने में जूटी हुआ है तो वहीं दूसरी तरफ भारत ने भी चीन को जवाब देने के लिए आगे बढ़ने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसी का नतीजा है कि भारत चीन सीमा के पास लगातार सामिरक महत्व के निर्माण कर रहा है। असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने के लिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बने 9.15 किमी लंबे पुल को इसी कड़ी में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन

बता दें कि 26 मई को बीजेपी सरकार को शपथ लिए हुए पूरे तीन साल हो जाएंगे और 26 मई को ही पीएम मोदी देश के सबसे लंबे पुल 9.15 किमी के धौला-सदिया ब्रिज को देश को समर्पित करेंगे। ये कार्यक्रम सिर्फ मोदी सरकार के तीन साल पूरे और उनकी उपलब्धि के लिए ही नहीं बल्कि असम सरकार के एक साल पूरे होने पर पूरे राज्य में ये कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुल का एक छोर सादिया है और यह वही स्थान है, जहां मशहूर संगीतकार भुपेन हजारिका का जन्म हुआ था।
धौला-सदिया है देश का सबसे लंबा पुल

धौला सदिया पूरे देश में अब तक का सबसे लंबा पुल है जिसकी लंबाई 9.15 किमी है और यह मौजूदा वक्त में सबसे लंबे बांद्रा-वर्ली सी लिंक 5.6 किमी (मुंबई) से 3.55 किमी लंबा है। इसके अलावा बिहार के भागलपुर नें गंगा नदी पर बना विक्रमशिला सेतु की लंबाई 4.7 किमी, केरल में वेम्बानंद झील पर बने वेम्बानंद रेल पुल की लंबाई 4.62 किमी है। बिहार के ही पटना में गंगा नदी पर बना दीघा-सोनपुर ब्रिज 4.5 किमी और आरा में गंगा नदी पर बना आरा-छपरा ब्रिज 4.3 किमी लंबा है। 950 करोड़ रुपये में बनकर तैयार हुए इस पुल का निर्माण 2011 में शुरू हुआ था।

पुल बनने से स्थानीय लोगों को होगा ये फायदा

इस पुल से पहले यहां तेजपुर में कालिया भोमोरा के बाद 375 किमी तक ब्रह्मपुत्र नदी पर कोई पुल नहीं है। इस पुल से स्थानीय लोगों को काफी फायदा मिलने वाला है। ये दोनों तटों के आर-पार सामान लाने जाने के लिए सही और सीधा रास्ता है। नदी के दोनों तरफ रहने वाले लोगों को इससे समय की भी काफी बचत होगी और लोगों के करीब 8 घंटे बचेंगे। इस पुल के चालू होने से असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच यात्रा के समय में 4 घंटे तक की कटौती होगी। इस पुल के बन जाने से स्थानीय लोगों को नजदीकी रेलवे स्टेशन तिनसुखिया और एयरपोर्ट डिब्रूगढ़ पहुंचने में आसानी होगी।

सामरिक महत्व की खुबियां

इस पुल में काफी खुबियां हैं यू तो ये पुल देश का सबसे लंबा पुल है ये पुल युद्धक टैंक के भार को झेल सकता है। साथ ही ये पुल इसलिए भी खास है। क्योंकि यहां से चीन बॉर्डर की हवाई दूरी करीब 100 किमी है। इस पुल से सेनाओं की चीन बॉर्डर (वैलोंग-किबिथू सेक्टर) पर आवाजाही आसान हो जाएगी। 1962 के युद्ध के वक्त यह हिस्सा उत्तर-पूर्व के तवांग क्षेत्र में आता था। यह पुल असम की राजधानी दिसपुर से करीब 540 और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी इटानगर से करीब 300 किमी की दूरी पर बना है।

चीन बॉर्डर के पास और भी प्रोजेक्ट हैं

भारत अब चीन की किसी भी चुनौती से लड़ने के लिए उत्तर की सीमाओं तक पहुंचने के लिए सरल और आसान रास्ते बनाने पर काम कर रहा है। इसके अलावा हमेशा की तरह पाकिस्तान इस बार भी भारत के रास्ते में रोड़े का काम कर रहा है और मुसीबतें खड़ी कर रहा है। कश्मीर घाटी में पहुंचने के लिए हाल ही में सरकार ने जम्मू-कश्मीर के चनैनी और नाशरी के बीच बनी यह 9.28 किमी लंबी सुरंग देश की सबसे लंबी सुरंग का उद्घाटन किया है। यह सुरंग विपरीत मौसम में भी चालू रहेगी। इसके अलावा उत्तराखंड में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर भी बात आगे बढ़ गई है। यह रेल मार्ग भी सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इसी तरह से उत्तराखंड में बन रहे ऑल वेदर रोड को भी पर्यटन के अलावा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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