कांग्रेस लगाएगी भाजपा के बागियों पर दांव!

देहरादून। भाजपा में टिकट वितरण के बाद जारी घमासान पर नजर टिकाये हुए कांग्रेस की नजर अब ऐसे दमदार प्रत्याशियों पर टिक गयी है जिसके सहारे वह कई सीटों पर मुकाबले को बराबर में ला सकती है। बताया जाता है कि पार्टी में टिकट वितरण पर जो देरी हो रही है यह उसके लिए एक प्रमुख कारण भी है। बागियों को टिकट देने से कुछ क्षेत्रों में सीटिंग विधायकों की उपेक्षा की गयी है तो कुछ सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों को मैदान से हटा दिया गया है जो कि पिछला चुनाव मामूली अंतर से हारे हैं। जिन सीटिंग विधायकों के टिकट काटे गए हैं उसमें चैबट्टाखाल से विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत पार्टी के निर्णय को लेकर मुखर हैं।

कांग्रेस तीरथ के संपर्क में है और महाराज के खिलाफ उन्हें मैदान में उतारने की कोशिश कर रही है। यमकेश्वर से तीन बार की विधायक रही विजय बड़थ्वाल का टिकट काटने के बाद बड़थ्वाल पार्टी को खरी-खरी सुना रही हैं| वह स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का ऐलान कर चुकी है। इस सीट पर पूर्व सी.एम खंडूरी की पुत्री मैदान में है, लेकिन उन्हें टिकट के अन्य दावेदार भी पचा नहीं पा रहे हैं।

कांग्रेस की नजर इस समय सीट पर कद्दावर बागी पर है जो कि समीकरण से तालमेल बिठा सके। वहीं कोटद्वार में प्रभावशाली नेता पूर्व विधायक शैलेन्द्र रावत का टिकट काटकर बागी नेता हरक सिंह रावत को दे दिया गया है। शैलेन्द्र पार्टी से इस्तीफा देकर निर्दलीय मैदान में उतरने की बात कह चुके हैं। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस शैलेन्द्र रावत के संपर्क में भी है। शैलेन्द्र को कांग्रेस यमकेश्वर से भी मैदान में उतार सकते हैं, क्योंकि विधायक से पहले वह दुगड्डा ब्लाक से प्रमुख रह चुके हैं। क्षेत्र में शैलेन्द्र रावत का भी खासा जनाधार माना जाता है| इससे उनका लाभ कोटद्वार विधानसभा में भी पार्टी को मिल सकता है। स्थानीय होने के साथ ही धनौल्टी में सीटिंग विधायक महावीर रांगड़ का टिकट कटने से उनके समर्थक खासे नाराज होकर भाजपा मुख्यालय में डटे हुए हैं। यहां से राजनाथ के समधी पूर्व मंत्री नारायण सिंह राणा को पार्टी की ओर से टिकट दिया गया है।
हरिद्वार की ज्वालापुर सीट से चंद्रशेखर भट्टेवाला का टिकट कटने से समर्थक उन पर चुनाव लड़ने का दबाव बना रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की भी उन पर नजर है। कर्णप्रयाग से पूर्व विधायक आशा नौटियाल का टिकट काटकर बागी शैला रानी रावत को थमा दिया गया है। इससे आशा ने भी चुनाव मैदान में उतरने की हुंकार भरी है। बताया जाता है कि भाजपा हाईकमान सीटिंग विधायकों अथवा कद्दावर दावेदारों के टिकट कटने के बाद भी उपजे बिद्रोह को गंभीरता से नहीं ले रहा है। अपने सभी दांव आजमाने के बाद सभी विधायक अब बतौर निर्दलीय अथवा कांग्रेस के टिकट पर संभावना तलाश रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस फूंक-फूंककर नफा-नुकसान का आकलन करते हुए सूची को अंतिम रूप देने में जुट गयी है। ऐसे में अगर, भाजपा अपने बागियों को साधने में असफल रही तो उसे कई सीटों पर खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।

2012 को दोहरा रही है भाजपा

जिस तरह से बाहरियों पर भरोसा और अपनों की उपेक्षा भाजपा में हो रही है उससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि भाजपा कहीं मिशन 2012 की राह पर तो नहीं चल रही है। 2012 में 8 सीटिंग विधायकों का टिकट काटना भाजपा को भारी पड़ गया| उस समय भी सर्वे की आड़ ली गयी थी। तब तत्कालीन सी.एम भुवनचंद खंडूरी और चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष भगत सिंह कोश्यारी की जोड़ी चुनाव के बाद टिकट वितरण को लेकर निशाने पर आयी थी।

इस बार गढ़वाल में खंडूरी के समर्थकों अथवा उनकी पसंद के बागियों को टिकट दिये गए तो कुमाऊं में कोश्यारी समर्थकों को टिकट दिये गए। कुमाऊं की स्थिति तो यह है कि दो घंटे की ज्वाइनिंग के बाद दो टिकट तक पक्के हो गए हैं। वहीं कुछ मामलों में बागी स्थानीय नेताओं को ओवरटेक कर मनपसंद सीटों पर टिकट लेने में सफल रहे। तब न खंडूरी जरूरी का नारा प्रभावी रहा और न ही भाजपा कांग्रेस के अंतर्कलह को भुना पायी। ऐसे में एक बार फिर बगावत ने आशंका खड़ी कर दी है।