मैरिटल रेप विवाद में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से किया याचिका पर बड़ा सवाल

नई दिल्ली। इन दिनों देश में एक नई बात पर बहस चल रही है ये बात है वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए इस मामले में कथित नारीवादी और महिला के उत्थान प्रकरण से जुड़े चंद लोगों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की है। इससे पहले इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी कई अपीलें हुई है।

ताजा प्रकरण में दिल्ली हाईकोर्ट ने मौजूदा याचिकाकर्ता से सवाल पूछते हुए कहा कि अगर ऐसी ही याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुनवाई कर रहा है और तो फिर हाइकोर्ट में सुनवाई की क्या जरूरत है। अगर सुप्रीम कोर्ट में भी दायर याचिका उन्ही बिंदुओं पर है जिन पर यहां पर याचिका दाखिल की गई है तो लिहाज से इस पर सुनवाई की ज़रूरत नहीं है। इस मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप को लेकर बहस कर रहे वकीलों को अगली सुनवाई में कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया है। जिससे कोर्ट इस मामले में ये पता लगा सके की क्या दोनों याचिकाओं में एक समान बिन्दु है या अलग-अलग। फिलहाल इस मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।

इसके पहले इस प्रकरण पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने बहस के लिए 4 सितंबर की तारीख तय की थी । इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका डाली गई है। इस मामले को एक घटना बताकर अब एक महिला कोर्ट की दहलीज पर आ पहुंची है। जहां पर याचिकाकर्ता की ओर से वकील कोलिन गोंजाल्विस ने वैवाहिक बलात्कार की खिलाफत करते हुए उसे अपराध की श्रेणी में डालने की वकालत की है।

हांलाकि इस मामले में केन्द्र सरकार अपना हलफनामा दाखिल करते हुए साफ कहा है कि अगर वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया गया तो विवाह जैसी परम्परा और संस्था ढह सकती है। इसके साथ ही पतियों को परेशान करने का आसन हथियार भी मिल सकता है। कानून बनाने का मतलब ये नहीं कि किसी के हाथ में सत्ता दे दी जाए। क्योंकि पति और पत्नी के बीच बने यौन संबंध का कोई विशिष्ट सबूत नहीं है जो साबित करे कि ये बलात्कार है।

इस जनहित याचिका में इस तरह की घटना बताने वाली महिला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विलस ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि शादी का मतलब ये नहीं है कि पति अपनी पत्नी के साथ उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाए। विवाह को किसी लाइसेंस की तरह नहीं देखा जाना चाहिए कि पति अपनी पत्नी के साथ उसकी मर्जी के बिना बलात्कार करता रहे। उन्होने अफी दलील में कहा कि जैसे एक अविवाहित महिला को अपने शरीर का अधिकार प्राप्त होता है। उसी तरह एक विवाहिता को भी दिया जाना चाहिए, इस लाइसेंस की आड़ में कोई उसकी मर्जी के खिलाफ कुछ ना कर सके। इसके साथ ही उन्होने कहा कि शादी का मतलब ये नहीं होता है कि औरतों को दास बना दिया जाए।

उन्होने अपनी दलील में कहा कि नेपाल जैसे देश ने भी साल 2001 में साफ करते हुए इस विषय पर वहां के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई पुरूष अपनी विवाहित पत्नी की मर्जी के खिलाफ उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो वह उसकी स्वतंत्रता का हनन करता है। इसके साथ ही याचिकाकार्ता ने दलील देते हुए कहा कि कई यूरोपियन देशों मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में डाला गया है। फिलिपींस जैसा देश भी शादी के बाद जबरन सेक्स को अपराध मानता है। तो भारत में इसे क्यूं नहीं लागू किया जा रहा है।

इसके पहले इसी तरह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी देते हुए साफ किया कि जबरन वैवाहिक यौनसंबंध बलात्कार में शामिल किया जाये या नहीं इस पर काफी बहस पहले हो चुकी है। इसको भारतीय परिवेश में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता है।अदालत ने साफ कहा कि इस पर संसद में काफी बहस हो चुकी है। इसे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में लाने से विवाह की संस्था पर असर पड़ सकता है। इसे किसी भी हाल में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता है।