गुरु समान दाता नहीं कोई…

नई दिल्ली। ‘गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय..’ विश्व प्रसिद्ध इस दोहे में महान कवि कबीर दास ने गुरु को ईश्वर से बड़ा स्थान दिया है। हमारे देश और समाज में गुरु को व्यक्ति के जीवन का ‘पथ प्रदर्शक’ कहा जाता है। गुरुओं को समर्पित पांच सितंबर पूरे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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यूं तो पूरे विश्व में शिक्षक दिवस इस तारीख के ठीक एक महीने बाद 5 अक्टूबर के रूप प्रसिद्ध है, लेकिन हमारे देश में शिक्षक दिवस पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन (पांच सितंबर) के रूप में मनाया जाता है। हमारे देश में अनेक विभूतियों ने अपने ज्ञान से लोगों का मार्गदर्शन किया है। उन्हीं में से एक महान विभूति, शिक्षाविद्, दार्शनिक, महानवक्ता व विचारक थे डॉ. राधाकृष्णन। इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया। स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन से एक बार कुछ शिष्यों एवं प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन माने की अनुमति मांगी थी। राधाकृष्णन ने कहा था, “हां, शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की अनुमति है।” तब से हमारे देश में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

शिक्षक और छात्र के बीच की एक बहुत ही मतबूत डोर होती है। एक आर्दश शिक्षक केवल अपने छात्र को केवल स्कूली ज्ञान ही ही नहीं बल्कि उसे जीवन भर का पाठ पढ़ाता है। शायद इसीलिए संत कबीर ने कहा है, “गुरु समान दाता नहीं, याचक शीश समान..तीन लोक की संपदा, सो गुरु दीन्ही दान..” इस दोहे में कबीर ने शिक्षक की महिमा कर कहा है कि गुरु के समान कोई दाता नहीं, और शिष्य के सदृश याचक नहीं। गुरु ने तीनों लोक की संपत्ति से भी बढ़कर ज्ञान का दान दिया है।

शिक्षक दिवस की महत्ता की चर्चा करने पर रामलाल आनंद कॉलेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार शर्मा ने कहा, “शिक्षकों को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के मार्ग पर चलना चाहिए। शिक्षकों को अपने छात्रों के जीवन को संवारने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। जब देश के नेताओं के पास किसी विषय का स्थायी समाधान नहीं होता है, तो एक शिक्षक के पास उसका समाधान होता है।”

डॉ. शर्मा ने छात्रों को संदेश देते हुए कहा, “छात्रों को देश को मजबूत बनाने और उसकी अखंडता के लिए काम करना चाहिए। वहीं जाति-धर्म संप्रदाय को दरकिनार सही आदर्शो पर चलें।” दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य विभाग के प्राध्यापक डॉ. सुभाष चंद्र डबास ने छात्रों के लिए अपने संदेश में कहा, “छात्रों को अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को बड़ा स्थान देना चाहिए। नैतिक मूल्यों से ही समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण हो सकता है। छात्रों में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए किताबी ज्ञान के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान का होना भी बहुत जरूरी है, इसलिए उन्हें इस ओर खास ध्यान देना चाहिए।”

कानपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एंव जनसंचार विभाग के व्याख्याता डॉ. जीतेंद्र डबराल से जब पूछा गया कि इंटरनेट और ई-एजुकेशन के दौर में शिक्षक की भूमिका क्या रह गई है, तो उन्होंने कहा, “ई-एजुकेशन सूचना का माध्यम है, विस्तार से समझाने वाला नहीं। एक छात्र को इंटरनेट पर शिक्षा से जुड़ी सब सामग्री मिल सकती है, लेकिन इंटरनेट छात्र को उस सामाग्री का सार नहीं समझा सकता, इसीलिए शिक्षक की प्राथमिकता हमेशा बनी रहेगी।”

शिक्षक की भूमिका छात्रों के जीवन र्पयत तक रहती है, ऐसे में केवल एक दिन शिक्षक दिवस क्यूं मनाना जरूरी है, इस पर उन्होंने कहा, “छात्र और शिक्षक के बीच का संबंध ताउम्र रहता है, ऐसे में एक दिन का तात्पर्य ठीक फ्रेंडशिप डे या स्वतंत्रता दिवस की तरह है, स्वतंत्रता केवल एक दिन नहीं होती, बल्कि उसे एक खास दिन पर मनाया जाता है। इसी तरह शिक्षक दिवस भी एक विशेष दिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर मनाया जाता है।” छात्रों के लिए अपने संदेश में उन्होंने कहा, “छात्रों में हमेशा सीखने की इच्छा होनी चाहिए। जिस छात्र में ज्ञान को पाने की ललक होती है, वह हमेशा एक आर्दश छात्र होता है।”

किसी भी छात्र के जीवन में शिक्षक की बड़ी भूमिका होती है। स्कूली शिक्षा से लेकर पेशेवर बनने तक की राह में शिक्षक का एक खास स्थान होता है। छात्र जीवन पर शिक्षक की महत्ता पर दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा पूर्णा दुबे कहती हैं, “शिक्षक हमें केवल स्कूली पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों भी सिखाते हैं। वह हमें अच्छा नागरिक बनने को प्रेरित करते हैं और समाज में एक बेहतर स्थान हासिल करने की सलाह देते हैं।”

वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय के वाणिज्य विषय के छात्र प्रवीण ने कहा, “मेरे जीवन में मां-बाप के बाद गुरु का ही स्थान है। मुझे अब तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों ने मेरा बहुत मार्गदर्शन किया है और सभी से मुझे जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है।”