भारत-चीन सीमा को जोड़ने वाली गर्तांगली का होगा पुनरुद्धार

उत्तरकाशी। भारत में जो लोग रोमांच के शौकीन है उनके लिए एक बेहद ही खास खबर है। रोमांच के शौकीन लोग अब उत्तरकाशी जिले में समुद्रतल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर गर्तांगली की सैर कर सकेंगे। राज्य सरकार ने इसके पुनरोद्धार के लिए कार्रवाई शुरू कर दी है। बताते चलें कि भारत-चीन सीमा पर जाड़ गंगा घाटी में स्थित सीढ़ीनुमा यह मार्ग दुनिया के सबसे खतरनाक रास्तों में शुमार है।

पर्यटन मंत्री के निर्देश पर पिछले दिनों जिलाधिकारी ने इस मार्ग का स्थलीय निरीक्षण किया। करीब 300 मीटर लंबी यह गली एक दौर में भारत-तिब्बत व्यापार का प्रमुख मार्ग हुआ करती थी। कहा जाता है कि 17वीं सदी में पेशावर से आए पठानों ने चट्टान को काटकर यह मार्ग बनाया था।

भारत-चीन युद्ध से पहले व्यापारी इसी रास्ते से ऊन, चमड़े से बने वस्त्र व नमक लेकर तिब्बत से बाड़ाहाट (उत्तरकाशी का पुराना नाम) पहुंचते थे। युद्ध के बाद इस मार्ग पर आवाजाही बंद हो गई, लेकिन सेना की आवाजाही जारी रही। लेकिन, वर्ष 1975 से सेना ने भी इस रास्ते का इस्तेमाल बंद कर दिया। तकरीबन 42 साल से मार्ग का रखरखाव न होने के कारण वर्तमान में इसकी सीढ़ियां और उनके किनारे लगी लकड़ियों की सुरक्षा बाड़ भी खराब हो चुकी हैं। हालांकि, सुखद यह कि अब राज्य सरकार इस मार्ग को दुरुस्त करने के लिए सक्रिय हो गई हैं।

पिछले दिनों पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने जिलाधिकारी को पर्यटन अधिकारी व गंगोत्री नेशनल पार्क के अधिकारियों के साथ मार्ग का स्थलीय निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे। इस पर 13 अप्रैल को जिलाधिकारी डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने भैरवघाटी के निकट लंका से करीब ढाई किलोमीटर पैदल चलकर गर्तांगली का निरीक्षण किया। वे करीब सौ मीटर तक इस मार्ग पर गए। डीएम ने बताया कि गर्तांगली को दोबारा खोलने का उद्देश्य पर्यटकों को यह अहसास कराना है कि कभी कैसे जोखिम भरे रास्तों से जीवन चलता था। बताया कि दुनिया के इस सबसे दुर्गम रास्ते की मरम्मत के लिए रिपोर्ट तैयार कर जल्द ही शासन को भेजी जाएगी।

ग्राम पंचायत हर्षिल की प्रधान 75 वर्षीय बसंती देवी बताती है कि 1965 में आखिरी बार लोक निर्माण विभाग ने गर्तांगली की मरम्मत की थी। वर्तमान में यह मार्ग पांच से अधिक स्थानों पर क्षतिग्रस्त है।