इस जगह एक खास रस्म में भगवान खेलते है होली

जगदलपुर। बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय में होलिका दहन रस्म के दूसरे दिन पादुका पूजन व रंग-भंग नामक अनोखी और निराली रस्म होती है। होलिका दहन स्थल की राख से आराध्य देवी मां दंतेश्वरी, मंडई में आंमत्रित देवी-देवताओं तथा पुजारी और सेवादारों के साथ होली खेलती हैं। फागुन मंडई के अंतिम रस्म के रूप में विभिन्न ग्रामों से मेले में पहुंचे देवी-देवताओं को विधिवत विदाई दी जाती है। मां दंतेश्वरी मंदिर के सहायक पुजारी हरेंद्र नाथ जिया ने बताया की सती सीता की प्राचीन प्रतिमा लगभग सात सौ साल पुरानी है। एक ही शीला में युगल प्रतिमा को राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा यहां स्थापित किया गया था। तब से फागुन मंडई के दौरान यहां होलिका दहन और देवी-देवताओं के होली खेलने की परंपरा चली आ रही है।

करीब सात सौ साल पुरानी प्राचीन सती सीता प्रतिमा की विधिवत स्थापना पुजारी हरेंद्र नाथ जिया और पंडित रामनाथ दास द्वारा वैदिक मंत्रोचार के साथ की गई। प्रतिमा पुलिया निर्माण के चलते शनि मंदिर में रखवाई गई थी। प्राचीन सती सीता प्रतिमा स्थल पर ऐतिहासिक फागुन मंडई के दौरान आंवरामार रस्म के बाद होलिका दहन की जाती है। यहां जन समूह की उपस्थिति में बाजा मोहरी की गूंज के बीच प्रधान पुजारी जिया बाबा द्वारा होलिका दहन की रस्म अदा की जाती है। इस दौरान गणेश्वर मिश्रा मुकुंद ठाकुर, शिवचंद कतियार, इतवारी नाइक, जयसिंह, मधुसूदन सेठिया समेत अन्य सेवादार शामिल रहे। फागुन मंडई में आंवरामार रस्म के बाद सती सीता स्थल पर होलिका दहन की जाती है।

यहां गंवरमार रस्म में गंवर (वनभैंसा) तैयार करने प्रयुक्त बांस का ढांचा तथा ताड़ फलंगा धोनी में प्रयुक्त ताड़ के पत्तों से होली सजती है। इसके बाद मंदिर के प्रधान पुजारी द्वारा पारंपरिक वाद्ययंत्र बाजा मोहरी की गूंज के बीच होलिका दहन रस्म पूरी की जाती है। पूरे देश में जहां होली के अवसर पर रंग-गुलाल खेलकर अपनी खुशी का इजहार किया जाता है। वहीं बस्तर में होली के अवसर पर मेले का आयोजन कर सामूहिक रूप से हास-परिहास करने की प्रथा आज भी विद्यमान है।

इतिहासकारों का कहना है कि बस्तर के काकतीय राजवंशियों ने इस परम्परा की शुरुआत माड़पाल ग्राम में आयोजित किये जाने वाले होलिका दहन कार्यक्रम से की थी। बस्तर के दशहरा उत्सव की तरह होलिका दहन कार्यक्रम भी अनूठा है। माड़पाल, नानगूर तथा ककनार में आयोजित किये जाने वाले होलिका दहन कार्यक्रम इसके जीते-जागते उदाहरण है। स्थानीय लोगों का कहना है कि काकतीय राजवंश के उत्तराधिकारियों द्वारा आज भी सर्वप्रथम ग्राम माढ़पाल में सर्वप्रथम होलिका दहन की जाती है, इसके बाद ही अन्य स्थानों पर होलिका दहन का कार्यक्रम प्रारंभ होता है। माढ़पाल में होलिका दहन की रात छोटे रथ पर सवार होकर राजपरिवार के सदस्य होलिका दहन की परिक्रमा भी करते हैं, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में वहां आदिवासी एकत्रित होते हैं।