बांके बिहारी के प्राकट्य उत्सव पर निधिवन में मची धूम

नई दिल्ली। भगवान अपने भक्तों के लिए हमेशा हाजिर रहते हैं बस भक्त भगवान को सच्चे मन से याद करे। ऐसी ही एक भक्ति वृंदावन में कई शताब्दियों पहले देखने को मिली जब संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी को भगवान ने आकर दर्शन दिया। भगवान के इस प्राकट्य दिवस को तब से बांके बिहारी जी के प्राकट्य उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। वृंदावन में स्थित निधिवन में बांके बिहारी का एक दिव्य मंदिर है। इस मंदिर में श्याम वर्ण की बिहारी जी की प्रतिमा लगी हुई है। मान्यता है कि इस प्रतिमा में राधा-कृष्ण दोनों समाए हुए हैं। इस प्रतिमा का प्राकट्य मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को हुआ था। इस प्रतिमा और मंदिर के दर्शन मात्र से मानव जाति का कल्याण हो जाता है।

बिहारी जी के प्राकट्य की कथा अद्भुत है, कहा जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी केवल भगवान कृष्ण को रिझाने के लिए ही गाना गाते थे। भगवान भी अपने भक्त के गायन पर रीझ कर रासस्थली निधिवन में रास करते थे। एक शिष्य में प्रभु के अद्भुत दर्शन की इच्छा व्यक्त की तो स्वामी जी ने भगवान के लिए गीत गाना शुरू किया । एकाएक राधा-कृष्ण की जोड़ी प्रकट हो गई। इसके बाद रास खत्म होने पर श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास की इच्छा पर उन्होने नित्य दर्शन देने का आश्वासन दिया।

जिसके बाद बताया जाता है कि वो दोनों एक ही विग्रह में समा गए और एक मूर्ति के स्वरूप में वहां प्रकट हुए। श्याम वर्ण की इस मूर्ति को स्वामी हरिदास ने बाके बिहारी का नाम दे दिया। निधिवन में स्थित इस मंदिर में कहा जाता है कि प्रत्येक शाम को सूर्य अस्त के बाद यहां पर कोई आता जाता नहीं है। भगवान यहां पर आकर कर नित्य रास करते हैं। दिन में सुबह यहां श्रृंगार का सामान बिखरा मिलता है। बिस्तर अस्त-व्यस्त हुआ मिलता है। यहां पर मौजूद विग्रह के दर्शन से भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं।