जानिए: क्यों आज भी बुरहानपुर के इस महल में भटकती है मुमताज की आत्मा

नई दिल्ली। शाहजहां और मुमताज के प्रेम की कहानियां तो सभी ने सुनी होंगी और सब ये भी जानते हैं कि शाहजहां मुमताज से कितनी मोहब्बत करते थे कि उन्होंने उनकी याद में ताजमहल जैसी हसीन चीज बनवा दी। लेकिन मुमताज के बारे में जो बात आज आपको हम बताने जा रहे हैं वो शायद बहुत कम लोग जानते होंगे। मुमताज और शाहजहां का प्यार मध्य प्रदेश में बने बुरहानपुर के फारूखी काल के शाही किले में परवान चढ़ा था। इस किले की सिर्फ दिवारे ही नहीं बल्कि यहां कि हर एक चीज शाहजहां और मुमताज के प्यार की गवाह है। कहा जाता है कि आज भी मुमताज की आत्मा इस महल में भटकती है। जहां उन्हें दफनाया गया था।

बता दें कि 17 जून को 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मुमताज की मौत हो गई थी। बतौर बुरहान गवर्नर शाहजहां शाही के इस किले में लगभग 5 साल ही रहे। ये किला शाहजहां को इतना पसंद था कि अपने कार्यकाल के पहले तीन सालों में ही उन्होंने किले की छत पर दिवाने आम और दिवाने खास के नाम से दो दरबार बनवा दिए थे। शहाजहां ने इन सबसे अगल किले में एक ऐसी चीज बनवाई थी जहां वो अपनी बेगम मुमताज के साथ सकून के पल बीताते थे। मुमताज की मौत बुरहानपुर में ही हुई थी। लेकिन शहाजहां ने आगरा में ताजमहल बनवाकर अपनी बेगम को वहां दफनाया था। लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि ताजमहल बनने तक मुमताज के मृत शरीर को बुरहानपुर में ही दफनाया गया था। जिसकी वजह से लोग दावा करते हैं कि आज भी मुमताज की आत्मा उस महल में भटकती है किले से किसी औरत के चीखने और करहाने की आवाजें आती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ये आवाज मुमताज की ही हैं।

शहाजहां ने मुमताज के लिए महल में एक खास हमाम का निर्माण कराया था। जिसकी दिवारों से लेकर छत तक महीन कारीगरी की गई थी। जिस पर जयपुर के आमेर महल की तरह रंगीन कांच के टुकड़े जड़े हुए थे। जिसमें एक दिया जलाने से ही पूरे महल के कांच के टुकड़े जगमगा जाते थे। इसकी रोशनी जब बेगम पर पड़ती थी तो पन्ना निलम और अन्न रक्तों की चमक बिखर जाती थी। इस हमाम में मुमताज के नहाने के लिए गर्म पानी भरा जाता था और उस पानी में शहद चंदन दूध और गुलाब की पंखुड़ियों के साथ इत्र डाला जाता था। कहते हैं इस खास जहग की कुछ तस्वीरे भी यहां लगी थी जिनको देखकर शहाजहां को ताजमहल बनवाने की प्रेरणा मिली थी। कहते हैं 400 साल पहले जब मुमताज की मौत दुलारा महल में हुई थी तो शहाजहां ने बुरहानपुर में ही ताजमहल बनवाने की सोची थी लेकिन किसी कारण वो वहां ताजमहल नहीं बनवा सके।

उसके बाद जब आगरा में ताजमहल बनकर तैयार हो गया तो वहीं मुमताज की देह को ले जाकर दफनाया गया। वहां के लोगों का कहना है कि शाहजहां मुमताज के देह को वहां से ले तो गए लेकिन आज भी बुरहानपुर के महल में मुमताज की आत्मा भटकती है। लोगों का कहना है कि आज भी महल से मुमताज की आवाज आती हैं और वहां के लोगों के लिए ये आवाज सुनना कोई नई बात नहीं है ये उनके लिए बहुत ही आम बात है। लेकिन लोगों का कहना है कि मुमताज की आत्मा ने आज तक किसी को परेशान नहीं किया और न ही किसी को नुकसान पहुंचाया। मौजूद तथ्यों के आधार पर सन 1631 में अपनी बेटी को जन्म देने के कुछ दिन बाद ही मुमताज चल बसी थीं और यही वजह है कि उनकी आत्मा इस महल में ही बस गई।

रानी नक़वी