यहां सौ सालों से सुलग रही है धरती….

धनबाद। झारखंड में दामोदर नदी के एक छोर पर बसा झरिया सौ साल से आग में दहक रहा है। 100 सालों से सुलग रही इस आग ने अब ऐसा रूप धारण कर लिया है कि प्रशासन भी हैरान है। प्रशासन ने अब यहां रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगह पर भेजने की तैयारी कर ली है। जमीन के निचे लगी आग की वजह से यहां की जमीन खोखली हो गई है। जिसकी वजह से अक्सर यहां कि जमीन धंस जाती है और लोग समा जाते हैं। बुधवार को भी यहां की जमीन धंसने से दो लोगों की मौत हो गई।

बता दें कि झारिया थाना क्षेत्र में अचानक जमीन धंस गई और कुंआ के आकार में बदल गई। जिस जगह यह घटना हुई, वहीं पर एक युवक खड़ा था। जमीन के धंसते ही वो अंदर चला गया। पास में उसके पिता खड़े थे, जो युवक को बचाने के लिए दौड़े। इसी बीच वो भी लड़खड़ा कर जमीन के अंदर समा गए। 1916 में पहली बार भरा कोलियरी में आग लगने का पता चला था। साल 1973 में जब कोलफील्ड को राष्ट्रीयकृत किया गया तब यहां 70 जगाहों पर जमीन के नीचे कोयले में आग सक्रिय थी।

इलाकों में नहीं थी आबादी

आग का पहला सर्वे 1986 में हुआ तो पता चला कि आग 17 वर्ग किमी में फैल चुकी है। यहां लगी आग हर साल साल झरिया की एक बस्ती को अपना शिकार बना लेती है। अब तक ये आग झरिया से जूड़े 6.82 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वीरान बना चुकी है। यहां का 2.18 वर्ग किलोमीटर अब भी आग का दरिया बना हुआ है। 1890 में पहली बार धनबाद में कोयला होने का पता चला था।

1997 में उठा था आग का मुद्दा

1930 में अंग्रेजों ने यहां पहली कोयला खदान शुरू की थी। सुरंग बनाकर खनन की प्रक्रिया अवैज्ञानिक थी, जिसे आजादी के बाद निजी खदान मालिकों ने जारी रखा। सुरंग के रास्ते से आग को ऑक्सीजन मिली और वह दहक गई। झरिया की आग का मुद्दा 1997 में देश के सामने आया। पहले जहां सिर्फ एक खदान में आग का मामला सामने आया था, आज करीब 17 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल चुका है। 80 हजार से ज्यादा लोग जमीन के भीतर लगी आग से प्रभावित हैं।

इतना हो चुका है नुकसान

आग की वजह से 10 अरब से ज्यादा का कोयला जलकर राख हो चुका है। 314 करोड़ रु. आग प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर खर्च हुए। 83 हजार 640 परिवारों को सुरक्षित जगहों पर बसाने की योजना बनाई जा रही है। ताकि आग से उन लोगों को बचाया जा सके।