दीपावली, पटाखे और प्रदूषण…

नई दिल्ली।  दीपावली देश का सबसे बड़ा त्योहार है। दिवाली खुशीयों और रोशनी का त्योहर है इस बात में कोई शक नहीं है। दिवाली पर घर को सजाना, दीए लगाकर अमावस्या के इस दिन को रोशनी से भर देना दिवाली है। लेकिन दीपावली के दौरान जलाए जाने वाले पटाखों से इस त्योहार का कोई लेना देना नहीं है। क्योंकि दीपावली का त्योहार तो आज से 14,000 साल पहले भगवान राम के 14 वर्ष का वनवास काटने के बाद वापस अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया गया था। इस बात को सब जानते है कि उस समस पटाखें नहीं थे, अरे भई भारत में पटाखों का कारोबार ही 90 साल पहले शुरू हुआ है,इसलिए पटाखों को दिवाली की एक परंपरा बताना गलता है।

 

प्रदुषण से दिल के मरीजों की संख्या बढ़ी

दीपावली का अर्थ रोशनी से है न कि आतिशबाजी से। दिवाली पर पटाखों को जलाने से पर्यवरण पर बुरा असर पड़ता है इसमें कोई दोराय नहीं है। पटाखे पर्यवरण पर कहर बनकर टूटने के अलावा हमारे स्वास्थ्य को भी हानी पहुंचाते है। पटाखों के कारण दिल का दौरा,रक्त चाप, दमा, एलर्जी और न जाने कितनी तरह की बीमारियां आज हमारे आस-पस उत्पन्न हो गई है,खासकर दमा के मरीजो की संख्या में तो दिनों-दिनों इजाफा हो रहा है। दीपावली के एक दिन पर जलाए जाने वाले पटाखों से लगभग इतना प्रदुषण उत्पन्न होता है,जितना शयद पूरे साल में भी नहीं होता होगा।

सुनने की क्षमता पर पड़ता है असर

दिवाली के दौरान पटाखों से वातावरण में आवाज का स्तर 15 डेसीबल बढ़ जाता है जिसके कारण सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है। इससे कान के पर्दे फटने, दिल के दौरे पड़ने, सिर दर्द, अनिद्रा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्यायें उत्पन्न हो सकती हैं। तेज आवाज करने वाले पटाखों को चलाने का सबसे अधिक असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दिल व सांस के मरीजों पर पड़ता है। दिवाली के दौरान छोड़े जाने वाले पटाखों के कारण वातावरण में हानिकारक गैसों और निलंबित कणों का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिसके कारण फेफड़े, गले और नाक संबंधी गंभीर समस्यायें भी उत्पन्न होती हैं।

एक अध्ययन में पाया गया है कि दमा का संबंध हृदय रोगों और दिल के दौरे से भी है इसलिये दमा बढ़ने पर दिल के रोगों का खतरा बढ़ सकता है। तेज आवाज वाले पटाखे सामान्य पटाखों से अधिक खतरनाक हैं क्योंकि इनसे कान के पर्दे फटने, रक्तचाप बढ़ने और दिल के दौरे पड़ने की घटनायें बढ़ जाती हैं। बता दें कि इंसान के कानों के लिए 60 डेसीबल की आवाज सामान्य होती है। आवाज के 10 डेसीबल होने से बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दिल और सांस के मरीजों पर बुरा असर पड़ता है। अंत में इतना ही कहना चाहेंगे कि अगर प्राकृति से करते हैं प्यार तो इस दिवाली पटाखों को कहीए न।