लोकदल से किनारा कसने के लिए हुआ था कांग्रेस और सपा का विवाद!

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में सियासी पारा चुनावी दंगल होने की वजह से गरम है। कभी पार्टी की कलह तो कभी समझौते की रणनीति से प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल बढ़ी हुई है।

सूबे की समाजवादी पार्टी ने चुनावी रण में उतरने के पहले भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए बिहार चुनाव की तर्ज पर महागठबंधन कर चुनावी बिगुल फूंकने का प्लान बनाया था। कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर को साझाकर पार्टी अपने चुनावी समर का आगाज़ करने जा रही थी।

बनने के पहले टूटा त्रिगुट

इस चुनावी समर में पार्टी ने एक त्रिगुट तैयार किया था। जिसमें राष्ट्रीय लोक दल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को साथ मिलकर सीटें तय कर चुनावी रण में उतरना था। लेकिन ये त्रिगुट सीटों को लेकर हुए बंटवारे के बवाल के चलते बनने के पहले ही टूट गया। सीटों को लेकर ऐसा हाहाकार मचा कि राष्ट्रीय लोकदल ने अपनी राह पहले ही अलग कर ली। सूत्रों की माने तो सीटों को लेकर राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजीत सिंह कांग्रेस के ऊपर लगातार दबाव बना रहे थे। इसी दबाव के चलते सीटों को लेकर ये रार मचाई गई।

सीटों के बंटवारे को लेकर तनातनी

वैसे लोकदल को किनारा करने के लिए सीटों के बंटवारे में सपा और कांग्रेस के बीच भी जमकर तनातनी देखने को मिली एक बार तो गठबंधन के टूटने के आसार तक नजर आने लगे थे। लेकिन फिर अचानक ही राजनीति में एक नया मोड़ जो कि समझौते और बातचीत से बनाता है। आखिरकार बन ही गया। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन से किनारा कर चुकी लोकदल के खाते की सीटें समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के खाते में डाल दीं।

क्या थी दंगल की मुख्य वजह

वैसे चुनावी दंगल की स्थितियों का आंकलन किया जाये तो लोकदल पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट वोटों पर खासा पकड़ रखती है। लेकिन समाजवादी पार्टी वहां पर बीते सालों में हुए दंगों की वजह से खासा चर्चा में रही है। जिसके बाद वहां की गणित मुस्लिम और जाट वोटों को लेकर बंट सी गई है। जाट वोटों के साथ मुस्लिम वोटों की बाहुल्यता भी पश्चिम में ज्यादा है। अगर समाजवादी पार्टी लोकदल के साथ मिलकर वहां चुनावी रण में उतरती तो उसके परम्परागत वोट बसपा के पाले में चले जाते । इसके साथ ही जाट वोटर अजीत सिंह से दंगे में ना दिखने और साथ ना देने को लेकर खासा नाराज हैं। जिसके चलते वो वहां पर सपा को किसी कीमत पर नहीं चुन सकते थे और ना ही लोकदल के साथ पूरी तरह से जा रहे हैं। अगर गठबंधन होता तो जाट वोटों की नाराजगी भी भारी पड़ने वाली थी।

इन खास वजहों से सपा और कांग्रेस लोकदल के साथ तालमेल नहीं करना चाहती थी। लेकिन अपने रिश्तों को आगे की गणित के लिए खराब ना करने को लेकर सीटों के बंटवारे में आपसी दंगल खेल लिया। जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे। आखिरकार हुआ भी ऐसा ही लोकदल ने दंगल में अपने आपको पहले से अलग पर प्रदेश में अकेली ही चुनावी रण में उतरे की बात कहकर साफ कर दिया, कि रास्ता खुला है। अब सीटों के तालमेल को लेकर सारे दंगल के बाद आखिरकार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सहमती बन ही गई है।

अजस्रपीयूष