क्या नैतिकता के आधार पर अपर मुख्य सचिव को पद से हटाएंगे सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत?

नई दिल्ली। साल 2012 देवभूमि उत्तराखंड में एक भयानक हादसा हुआ। इलेक्ट्रानिक कंपनी ओनिडा में आग की लपटें उठीं इस अग्निकांड में 11 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सिस्टम ने इस कांड का खुलासा करने के बजाय इस पर पर्दा डालने का पहले तो प्रयास किया लेकिन पीड़ितों के परिजनों ने अपना संघर्ष जारी रखा । जिसके चलते कांड में अब एक नया और रोचक मोड़ आ गया है। इस मामले में तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह रहे ओम प्रकाश जो वर्तमान में अपर मुख्य सचिव के पद पर तैनात है इनकी भूमिका पर भी गम्भीर सवाल उठे हैं। नैनीताल हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्काल प्रभाव से एसआईटी जांच कराने के आदेश देकर एक बार फिर सत्ता के गलियाओं में हड़कम्प मचा दिया है।

बताया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण के बारे में जब जब आवाज उठी तब सत्ता के गलियारों में पीड़ित परिवारों के स्वरों को दबा दिया। आखिर इस पूरे प्रकरण के पीछे का मास्टर माइंड कौन है जिसके आगे प्रशासन और शासन बेबस होकर अपना तमाशा सरे बाजार बनवाता रहा है। क्योंकि इस मामले में कई तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया। साफतौर पर दिख रहे आरोपियों को बचाने के लिए ये पूरा प्रकरण कई बार साजिशों का शिकार भी बना। अब आपको बताते हैं कैसे कैसे इस प्रकरण में खेल पर खेल होता रहा और प्रशासन खुली आंखों से देखते हुए भी अनजान बना रहा।

पहले धाराओं में हुई छेड़छाड़
बताया जा रहा है कि जब साल 2012 में रूड़की के मगलोर स्थित ओनिडा फैक्टी में ये भयानक हादसा हुआ तो हादसे की गंभीरता देखते हुए हरिद्वार के तत्कालीन एसएसपी अरुण मोहन जोशी ने इस प्रकरण में फैक्ट्री के मालिक मीर चंदानी और जीएम के खिलाफ 304 की धारा में मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। लेकिन जब बात सत्ता के गलियारे तक आई तो ये सारे आदेश धरे के धरे रह गए जिस मामले में गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज होना था। उस मामले को साधारण दुर्घटना करार दे दिया गया। सूत्रों की माने तो ये सब कुछ तत्कालीन डीजीपी और तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह रहे ओम प्रकाश के दबाव में हुआ था। हांलाकि इस मामले में बड़े अधिकारी होने के नाते ओम प्रकाश बचते रहे। लेकिन तत्कालीन चार्ज पर आए डीआईजी केवल खुराना और इस मामले की जांच कर रहे अधिकारी एसआई राजीव डंडरियाल इस का खामियाजा भुगतना पड़ा। लेकिन सत्ता की हनक के चलते आखिरकार गैरइरादतन हत्या का मुकदमा मामूली दर्घटना के तौर पर सामने आया।

सबूतों के बाद भी सीबीसीआईडी में लगी अन्तिम रिपोर्ट
इस मामले को लेकर कई बार आवाज उठी सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों को इस हादसे के पीड़ितों ने अपना दर्द खुलकर दिखाया। आंदोलन किया धरना किया प्रदर्शन किया। सरकार ने इस मामले में अभियोजन की रिपोर्ट को संदेह के दायरे में बताते हुए फिर सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिए। हांलाकि ये गोटी सरकार के साथ सत्ता में बैठे लोगों की थी। जांच हुई कई चेहरे कई नाम सामने आते गए बताया जा रहा है कि इस मामले में भी तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह रहे ओम प्रकाश और डीजीपी पूरी तरह से संलिप्त रहते थे। कई बार जांच अधिकारियों को तलब किया गया। इस प्रकरण में प्रमुख सचिव गृह रहे ओम प्रकाश को लेकर ये भी कहा गया कि आरोपियों और विवेचक के बीच उन्होने इस प्रकरण में मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। इसलिए सबूतों के बाद भी सीबीसीआईडी ने इस प्रकरण में अन्तिम रिपोर्ट लगाई थी। जबकि इस प्रकरण की विवेचना के दौरान वादियों ने जितने भी विवेचक आये सभी को सामने वही बयान रखे तो पहले विवेचक के सामने थे। इसके बाद भी आरोपियों तक पुलिस नहीं पहुंच रही थी।

डीजीपी ने मामले की गंभीरता के बाद एसआईटी को नहीं दी जांच
लगातार मामला गंभीर होता जा रहा था। विवेचकों के तबादले होने के साथ जांच को प्रभावित करने की पूरा जतन होता था। सूत्रों की माने तो शासन में आरोपियों की मदद करने के लिए बैठकों का दौर चलता था। कई बार जिले स्तर के अधिकारियों को तलब किया जाता था। फरवरी का प्रकरण होते हुए भी इस मामले का पहला पर्चा जून में कटा था। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है, कि इतना संवेदनशील प्रकरण था लेकिन पुलिसिया जांच की रफ्तार कछुए की तरह ही थी। क्योंकि सत्ता के गलियारे में अपनी शतरंज की बिसात बिछाए लोग चालें चल रहे थे केवल बादशाह को बचाने के लिए, इसीलिए जब सीबीसीआईडी की अन्तिम रिपोर्ट सामने आई तो डीजीपी ने एसआईटी से प्रकरण की जांच नहीं कराने दी।

इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार के तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह रहे और वर्तमान में अपर मुख्य सचिव के पद पर तैनात ओम प्रकाश की भूमिका काफी संदिग्ध रही है। लेकिन देवभूमि का इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य यहां पर हर मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कुछ विशेष कृपा ऐसे अधिकारियों पर सरकार की हो जाती है जिनके दामन दागदार होते हैं। ये इस बार भी हुआ है इतने गम्भीर आरोपों के बाद भी आज के समय में ओम प्रकाश के पास 40 से अधिक विभाग हैं। सूबे की जीरो टॉलरेंस वाली त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार ने इस प्रकरण में सीबीआई या फिर एसआईटी जांच की ओर कदम बढ़ा कर आरोपियों की मदद करने वालों और आरोपियों के खिलाफ कुछ ना करते हुए ऐसे व्यक्ति के हाथों को ज्यादा मजबूत कर दिया है जो इस प्रकरण की जांच को एक बार फिर प्रभावित कर सकता है। हांलाकि इस बार नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बाद बैकफुट पर खेलने वाली सरकार को एसआईटी से इस प्रकरण की जांच करानी पड़ेगी। इस प्रकरण में सरकार के चहेते बने हुए अपर सचिव ओम प्रकाश की भूमिका को देखते हुए अब सरकार को सख्त निर्णय लेना होगा। क्या सरकार नैतिकता के आधार पर ओम प्रकाश को उनके पद से हटाएगी ये एक बड़ा यक्ष प्रश्न इस वक्त त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार के सामने आ गया है।