दक्षिण चीन सागर पर भारत का समर्थन नहीं चाहता चीन

बीजिंग। दक्षिण चीन सागर मुद्दा भले ही हाल के भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान उठा हो, लेकिन यह अनुमान कि चीन भारत का समर्थन हासिल करना चाहता है, गलत है। चीन की सरकारी मीडिया ने बुधवार को यह बात कही। ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में भारतीय मीडिया पर इस मुद्दे की याद दिलाने का आरोप लगाया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत ने दक्षिण चीन सागर विवाद पर अमेरिका और जापान के दबाव के बावजूद तटस्थ रुख अपनाए रखा है।

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लेख में कहा गया है, वांग की यात्रा के दौरान हो सकता है कि दोनों देशों ने इस पर चर्चा की हो और यह दोनों पक्षों के लिए संभव है कि इस मुद्दे पर अपने विचार, रुख और नीतियां स्पष्ट किए हों, लेकिन यह अनुमान कि वांग भारत को एनएसजी की सदस्यता पर सहायता देकर दक्षिण चीन सागर पर भारत का समर्थन हासिल करना चाहते थे, इसका कोई अर्थ नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय विवाद न्यायालय के अंतिम फैसले की घोषणा के बाद भारत सरकार ने अमेरिका और जापान के दबाव के बावजूद तटस्थ रुख अपनाए रखा। हालांकि भारतीय मीडिया ने वांग के दौरे को दक्षिण चीन सागर मुद्दे से जोड़ने और भारत की परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) में शामिल होने में नाकामी से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा।

भारतीय मीडिया ने हाल में खबर प्रकाशित की है कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी के नई दिल्ली दौरे का मकसद भारत के एनएसजी की सदस्यता के समर्थन के बदले दक्षिण चीन सागर विवाद पर भारत का समर्थन पाना था। अखबार ने कहा है कि चीन ने नहीं अमेरिका ने ही एनएसजी की सदस्यता के लिए संबंधित नियम बनाए थे। भारत उस क्लब में शामिल होने के लिए मानदंड पूरा करने में नाकाम है। एक दर्जन एनएसजी के सदस्य अब भारत के प्रयास का विरोध कर रहे हैं, इसलिए भारतीय मीडिया का आरोप लगाने के लिए चीन पर अंगुली उठाने का कोई मतलब नहीं है।

पीपुल्स डेली के अनुषंगी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारतीय मीडिया की कटु आलोचना की है। उसने दोनों देशों के रिश्तों को बर्बाद करने का आरोप लगाया है। इस लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि वांग का भारत दौरा मुख्य रूप से चीन में होने वाले जी20 और भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन पर केंद्रित था। लेख में कहा गया है कि चीन और भारत के बीच कुछ विसंगतियां हैं और टकराव हैं, लेकिन कुल मिलाकर द्विपक्षीय रिश्ते सही ढंग से आगे बढ़ रहे हैं। यह भी चेतावनी दी गई है कि दुश्मनी में बदलना दोनों में किसी के भी हित में नहीं है।

हम लोगों को व्यवधानों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। उसकी जगह परस्पर लाभ के लिए सहयोग के लिए जुड़ना चाहिए। सीमा विवाद जैसे लंबे समय से चल रहे कुछ विवादों की वजह से चीन और भारत के लिए सच्चा दोस्त बन पाना कठिन हो सकता है लेकिन दुश्मन बन जाने में किसी का भी हित नहीं होगा।