सभी राजनीतिक दलों के एजेंडे से गायब हुआ सस्ता न्याय

लखनऊ। सस्ते और सुलभ न्याय का ध्येय वाक्य आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को मुंह चिढ़ा रहा है। पश्चिम यूपी की दूसरी सबसे अहम इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच मांग है, जिसकी अनदेखी सभी राजनीतिक दलों के नेता करते आ रहे हैं। जनता को दिखाने के लिए वह बेंच निर्माण के आंदोलन में शामिल तो होते हैं, लेकिन जनप्रतिनिधि कभी एकसुर में लखनऊ के सत्ता प्रतिष्ठान में नहीं दहाड़े। इसी फूट का लाभ इलाहाबाद में बेंच निर्माण के विरोधियों ने उठाया है।

पश्चिमी यूपी के लोगों को न्याय पाने के लिए करीब 700 किलोमीटर दूर इलाहाबाद हाईकोर्ट जाना पड़ता है। जबकि पूर्वांचल के लोगों को लखनऊ में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच की सुविधा मिल रही है। हर बार चुनावों के समय पर राजनीतिक दल इस मांग को जायज बताकर आंदोलन की बात करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही यह मांग ठंडे बस्ते में चली जाती है। प्रदेश और केंद्र सरकार एक-दूसरे के पाले में मामले को टालते हैं तो कई बार इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पर मामला डाल दिया जाता है। केंद्र की भाजपा सरकार ने भी हाईकोर्ट बेंच को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई है।

1955 में उठी थी मांग

हाईकोर्ट बेंच की मांग 1955 में उठनी शुरू हुई थी तो इसके लिए विधिवत आंदोलन 1980 में शुरू हुआ। उसी समय से अधिवक्ताओं ने प्रत्येक शनिवार की हड़ताल शुरू की जो आज भी चली आ रही है। 1955 में ही तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद और 1976 में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा। लेकिन यह प्रस्ताव महज कागजी बनकर रह गए और लोग आज भी बेंच निर्माण की बाट जोह रहे हैं।

संविधान का उल्लंघन है मांग पूरी ना होना

अधिवक्ता परिषद् के प्रदेश महामंत्री चरण सिंह त्यागी का कहना है कि वेस्ट यूपी के लोगों को सस्ता व सुलभ न्याय ना मिलना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। संविधान की धारा 39-ए के अनुरुप वेस्ट के लोगों को सस्ता और प्रभावी न्याय निकटस्थ स्थान पर नहीं मिल पा रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण पहल का कहना है कि हाईकोर्ट बेंच के लिए 37 सालों के संघर्ष का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है।

कमजोर है राजनीतिक नेतृत्व

राजनीतिक दलों के नेता हाईकोर्ट बेंच की मांग का समर्थन तो करते हैं, लेकिन हकीकत में बेंच निर्माण की मांग में वेस्ट का राजनीतिक नेतृत्व कमजोर पड़ जाता है। वेस्ट यूपी में एक बड़ी जनसंख्या के निवास करने के बाद भी यहां बेंच का निर्माण ना होना दुखद है। मेरठ से इलाहाबाद हाईकोर्ट की दूरी 700 किलोमीटर से ज्यादा है। इलाहाबाद से निकट तो पाकिस्तान का लाहौर हाईकोर्ट स्थित है।

वकीलों का आंदोलन बिखरा

एक समय वेस्ट यूपी के वकील एकजुट होकर बेंच निर्माण के लिए आंदोलन चला रहे थे, लेकिन स्थान को लेकर मेरठ और आगरा के वकीलों के बीच मतभेद हो गया। इससे आंदोलन दो टुकड़ों में बंट गया। जबकि इलाहाबाद के वकील एकजुट होकर बेंच निर्माण का विरोध कर रहे हैं। वेस्ट यूपी के वकीलों का बंट जाना ही निर्माण के लिए पुख्ता दबाव नहीं बन पाना है।

बेंच निर्माण की प्रक्रिया लंबी

हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने के लिए पहले राज्य सरकार को केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव भेजना होता है। केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को सहमति के लिए संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजती है। जिस पर एक कोलेजन समिति अपनी रिपोर्ट लगाती है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्यवाही होती है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप कौंिशक का कहना है कि केंद्र सरकार चाहे तो इस संबंध में एडवोकेट जनरल की विधिक राय लेकर संसद में बिल पारित करा सकती है। इससे सीधे ही हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित कर सकती है।

बेंच नहीं तो वोट नहीं का नारा

इस बार अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट बेंच ना मिलने पर वोट नहीं डालने का नारा दिया है। हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति के चेयरमैन गजेंद्रपाल सिंह का कहना है कि पूरब के छल के कारण यहां के वकील लगातार छले जा रहे हैं। वहां के जनप्रतिनिधि भी वेस्ट यूपी में बेंच निर्माण का विरोध करते हैं। संघर्ष समिति ने निर्णय लिया है कि अगर वेस्ट में बेंच स्थापना पर कोई ठोस निर्णय ना लिया गया तो अधिवक्ता विधानसभा चुनावों में मतदान का बहिष्कार करेंगे। साथ ही भाजपा के बड़े नेताओं का भी वेस्ट यूपी में विरोध करने का निर्णय लिया गया। 4 फरवरी को मेरठ आने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी विरोध किया जाएगा।