यूपी-उत्तराखण्ड में खिलेगा कमल!

नई दिल्ली। यूपी विधानसभा चुनावों का बिगुल बजते ही सभी पार्टियां जनता के दिलों में उतरने के लिये कमर कस चुकी है। 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले है लेकिन सभी देशवासियों की निगाहें उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर टिकी हुई हैं। ये दो राज्य ऐसे है जहां पर जीतने के लिये सभी पार्टियां रण में उतरने के लिये पूरी एड़ी-चोटी का दम लगा देंगी। विशेषकर यूपी में जहां कि सत्ता पाना किसी भी पार्टी के लिये आसान नहीं है। यूपी में एक तरफ कांग्रेस अपनी खो चुकी जमीन को वापस पाने के लिये जद्दोजहद करने में लगी हुई तो दूसरी तरफ सपा में मचे दंगल ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। सपा में क्या-क्या हो रहा है इस पर ना सिर्फ राजनेता ध्यान दे रहे हैं बल्कि आम जनता का भी ध्यान बाप-बेटे की लड़ाई पर है।

सपा में संग्राम ने पूरे सूबे की सियासत को गर्मा दिया है। सपा संग्राम को छोड़ अगर चुनावी सर्वे की बात की जाये तो हर जगह पर बीजेपी का बोलबाला है। आकंड़ों में यह बात सामने आई है कि सपा में संग्राम का सीधा फायदा बीजेपी को होने वाला है। सर्वे की बात की जाये तो यूपी में बीजेपी का ‘वनवास’ खत्म होता दिख रहा है। एक निजी चैनल द्वारा कराये गये सर्वे में एक बात सामने निकल कर आई है कि यूपी की कुल 403 सीटों में से बीजेपी को 206-216 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिल सकता है। लेकिन यहां पर मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव पहली पंसद बनकर सामने आये हैं।

सपा, बसपा और कांग्रेस की स्थिति

सर्वे में समाजवादी पार्टी 92-97 सीटें हासिल कर राज्य की दूसरी बड़ी पार्टी बनती दिख रही है। सपा चल रहा सियासी ड्रामा किसी से नहीं छिपा, इसके कारण सूबे में चर्चाओं के बाजार में भी सपा ही छाई हुई है। इस वजह से चुनावों से पहले हुए सर्वे में समाजवादी पार्टी को मुनाफा होता भी दिखाई दे रहा है। हालांकि ये पार्टी किसकी है इस पर संग्राम अभी जारी है।

वहीं बात करें बहनजी की पार्टी बसपा की तो इसका जातिगत आधार किसी से नहीं छिपा, बुद्धिजीवियों की राय में आज भी अगर साइकिल के साथ कोई रेस लगा रहा है तो वह हाथी ही है। हालांकि सर्वे के समीकरणों के अनुसार बसपा तीसरे पायदान पर नजर आ रही है।

27 साल यूपी बेहाल के नारे से सूबे की सियासी जमीन पर शीला दीक्षित के सहारे कदम रखने वाली कांग्रेस की स्थिति भी कुछ खास नहीं है। कांग्रेस का लगातार गिर रहा जनाधार पहले ही कम मुसीबत खड़ी नहीं किए है, वहीं पार्टी को अब मजबूत बनाने के लिए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सामने लया गया है जिन पर पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कई आरोप लगा रखे हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस की स्थिति में ज्यादा बदलाव आने की उम्मीद नजर है।

चुनाव के अहम मुद्दे

नोटबंदी के फैसले पर सियासी दलो की उपेक्षा झेल रही भाजपा को भले ही जनता का साथ मिल रहा हो लेकिन कई तबके ऐसे भी ही हैं जो खुलकर मोदी विरोधी के रूप में सामने आए हैं। हालात ये हैं कि नोटबंदी का असर यूपी चुनाव में साफ पड़ता नजर आ रहा है।

सत्ताधारी पार्टी पर सपा पर शुरूआत से ही आम जनता का पैसा अपने निजी कामों के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगता रहा है। विकास की बात की जाए तो बीजेपी राज्यों के मुकाबले 5 सालों में यूपी में विकास काफी धीमी रफ्तार से हुआ है।

सपा राज्य में कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं। क्राइम का ग्राफ बढ़ा है, क्राइम के बढ़ते ग्राफ से अखिलेश की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है।

वर्तमान में प्रदेश की स्थिति ये है कि लोग बीजेपी को सत्ता देने के लिये तैयार है एक जनता अखिलेश के विकास को तो तवज्जों दे रही है लेकिन कालेधन के खिलाफ मोदी के उठाये गये कदमों के आगे वो भी बिना नमक के खाने की तरह हो गया है।

अखिलेश यादव बनें पहली पसंद

चुनावी सर्वे में जो बातें निकलकर सामने आई है उसमें अगर कोई राजनेता सबसे ऊपर दिख रहा है तो वो अखिलेश यादव है। प्रदेश में अखिलेश के कार्यकाल में हुए विकास ने जनता के दिलों में घर बना लिया है। सर्वे में अखिलेश लोगों की पहली पसंद के तौर पर ऊभर कर आए हैं।

क्या पहाड़ों में खिलेगा कमल ?

मैदानी क्षेत्रों को छोड़ जरा पहाड़ों की राजनीति की बात करें तो यहां भी भाजपा ने अपना दबदबा बनाया हुआ है। सर्वे के मुताबिक बीजेपी को 70 सीटों में से 35-43 सीटें, कांग्रेस को 22-30 सीटें मिलने का अनुमान है। चुनावी आंकड़े कहते हैं कि पिछले 5 सालों में कांग्रेस ने प्रदेश मे विकास तो किया है लेकिन चुनाव की तारीखें नजदीक आते ही कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए बागी विधायको ने पार्टी की छवि को धूमिल कर दिया है।

रावत पहली पसंद!

निजी चैनल द्वारा कराये गये सर्वे में बीजेपी को 40 प्रतिशत, कांग्रेस को 30 प्रतिशत लोगों का साथ मिल सकता है। हालांकि सीएम के लिए खंडूरी से पहले लोगों ने रावत को चुना है। खंडूरी को 13 प्रतिशत लोगों का साथ मिला, वहीं रावत को 19 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया है।

क्या है चुनावी मुद्दे?

पिछले विधानसभा चुनावों की तरह की इस बार भी बेरोजगारी और प्रदेश का विकास ही मुद्दा बना है। प्रदेश में ज्यादातार संख्या युवाओं की है तो वो प्रदेश में ही नौकरी चाहते है लेकिन उन्हें पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे युवा नाराज है।

 आशु दास