बासुकीनाथ को पूजे बिन बैद्यनाथ की पूजा अधूरी

दुमका। भगवान शिव के ज्योतिर्लिगों में से एक झारखंड के देवघर स्थित कामना ज्योतिर्लिग (बैद्यनाथ धाम) में जलाभिषेक करने वालों की पूजा बासुकीनाथ (नागेश) की पूजा बिना अधूरी मानी जाती है। यही कारण है कि बैद्यनाथ धाम आने वाले कांवड़िये बासुकीनाथ का जलाभिषेक करना नहीं भूलते। मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के दरबार में यदि ‘दीवानी मुकदमों’ की सुनवाई होती है तो बासुकीनाथ में ‘फौजदारी मुकदमों’ की। शिवभक्तों का विश्वास है कि बाबा बैद्यनाथ के दरबार की अपेक्षा बाबा नागेश के दरबार में सुनवाई जल्द पूरी हो जाती है।

pray

देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम से करीब 45 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ मंदिर झारखंड के दुमका जिले में स्थित है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर स्थित कामना लिंग पर जलाभिषेक करने आने वाले कांवड़िये अपनी पूजा पूरा करने के लिए नागेश ज्योतिर्लिग के नाम से विख्यात बासुकीनाथ मंदिर में जलाभिषेक करना नहीं भूलते। बासुकीनाथ के पंडा और धर्मरक्षिणी सभा के अध्यक्ष मनोज पंडा ने आईएएनएस को बताया कि कांवड़िये अपने कांवड़ में सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा नदी से जिन दो पात्रों में जल लाते हैं, उनमें से एक का जल बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करते हैं, जबकि दूसरे पात्र के जल से बाबा बासुकीनाथ का जलाभिषेक करते हैं।

देवघर कामना लिंग में जलाभिषेक के बाद कई कांवड़िये पैदल ही बासुकीनाथ धाम की यात्रा करते हैं, लेकिन ज्यादातर कांवड़िये वाहनों से ही बासुकीनाथ के दरबार पहुंचते हैं। शिवभक्तों को विश्वास है कि बाबा बासुकीनाथ के दरबार में मांगी गई मुराद जरूर व तुरंत पूरी होती है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में बासुकीनाथ का क्षेत्र घने वनों से आच्छादित इलाका था, जिसे उन दिनों दारुक वन का इलाका कहा जाता था। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी वन में नागेश्वर ज्योतिर्लिग का निवास था। शिव पुराण में मिले वर्णन के अनुसार यह दारुक वन दारुक नाम के राक्षस के अधीन था। माना जाता है कि दुमका का नाम भी इसी ‘दारुक वन’ से पड़ा है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एकबार बासुकी नाम का एक व्यक्ति कंद की खोज में भूमि खोद रहा था। उसी दौरान बासुकी का औजार भूमि में दबे शिवलिंग से टकरा गया और वहां से दूध की धारा बहने लगी। बासुकी यह देखकर भयभीत हो गया और भागने लगा। उसी वक्त एक आकाशवाणी हुई, “भागो मत, यह मेरा निवास स्थान है। तुम पूजा करो।” आकाशवाणी के बाद बासुकी वहां पूजा-अर्चना करने लगा और तभी से शिवलिंग की पूजा होने लगी जो आज भी जारी है।

बासुकी के नाम पर इस स्थल का नाम बासुकीनाथ पड़ गया। आज यहां भगवान भोले शंकर और माता पार्वती का विशाल मंदिर है। मुख्य मंदिर के नजदीक शिव गंगा है, जहां भक्त स्नान कर अपने आराध्य को बेल पत्र, पुष्प और गंगाजल समर्पित करते हैं तथा अपने कष्ट, क्लेश दूर करने की प्रार्थना करते हैं। बासुकीनाथ मंदिर के मोहन पंडा ने आईएएनएस से कहा, “बासुकीनाथ में शिव का रूप नागेश का है। यहां पूजा में अन्य सामग्री तो चढ़ाई जाती हैं, लेकिन दूध से पूजा करने का काफी महत्व है। मान्यता है कि नागेश रूप के कारण दूध से पूजा करने से भगवान शिव खुश रहते हैं।”

उन्होंने बताया कि यहां साल में एक बार महारुद्राभिषेक का आयोजन किया जाता है, जिसमें काफी मात्रा में दूध चढ़ाया जाता है। उस दिन यहां दूध की नदी सी बह जाती है। रूद्राभिषेक में घी, मधु और दही भी चढ़ाए जाते हैं। इस अनुष्ठान के समय भक्तों की भारी भीड़ एकत्र होती है।मोहन पंडा ने कहा कि यूं तो साल भर बासुकीनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, परंतु भगवान शिव के पवित्र महीने सावन में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इकट्ठा हो जाती है।

वह बताते हैं कि बैद्यनाथ धाम में सावन के महीने में स्पर्श पूजा की पद्धति समाप्त कर दिए जाने के बाद शिवभक्तों की भीड़ यहां बढ़ गई है, क्योंकि यहां आज भी स्पर्श पूजा जारी है। बासुकीनाथ मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं के 22 मंदिर हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बैद्यनाथ धाम, बासुकीनाथ और मंदिरों के गांव से मशहूर मलूटी को जोड़कर धर्म-सर्किट बनवाने की घोषणा की है।