बैंकों को कर्ज वसूली से ज्यादा लक्ष्य की फिक्र

दो साल पहले निर्मला देवकी ने अपनी चचेरी बहन की शादी के लिए स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से 50,000 रुपये का कर्ज लिया था। देश में ऐसे 39 लाख (सेल्फ हेल्प ग्रुप) एसएचजी चल रहे हैं जो 10,000 रुपये तक की छोटी रकम कर्ज देती है और शादी के लिए भी कर्ज देती है। देवकी कर्नाटक के उत्तरपूर्वी धारवाड़ जिले के दस्तीकोप्पा गांव की एक भूमिहीन किसान है। देशभर में कुल 4 करोड़ एसएचजी सदस्य हैं, जिन्हें एसएचजी 2 फीसदी ब्याज पर कर्ज मुहैया कराती है। देवकी को गायत्री सेवासहाय नाम की एसएचजी कर्ज देती है।

indian banks

आज देवकी के ऊपर एसएचजी का करीब 1 लाख रुपया कर्ज है और पांच बच्चों की इस विधवा मां का कहना है कि वे इसे लौटाएंगी नहीं। ऐसी ही करीब 80 लाख और महिलाएं भी हैं जो कर्ज चुकाने की हालत में नहीं है। देवकी का परिवार मजह 5,000 रुपये में जीवन यापन करता है, जो वह अपने एक गाय का दूध बेचकर कमाती है। वह कहती हैं, “स्वयं सहायता समूह की सदस्य बनना मदद से ज्यादा बोझ लगता है।” देशभर के गांवों में पिछले तीन सालों से बैंकों ने 9,000 करोड़ रुपये एसएचजी को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत कर्ज दिए थे। यह एक सरकारी कार्यक्रम है, जिसे पांच साल पहले ग्रामीण आय को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। लेकिन अब यह कर्ज गैर निष्पादित कर्ज (एनपीए) में बदल गया है।

इंडियास्पेड की मार्च, 2016 में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बैंकिंग प्रणाली में बुरे कर्ज का संकट 56,621 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और 5,000 बड़े कर्जदार हैं, जो जानबूझकर कर्ज नहीं चुका रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, एनआरएलएम मिशन के 77,650 करोड़ रुपये का 12 फीसदी हिस्सा पिछले तीन सालों में बकाया है। जबकि वाणिज्यिक बैंकिंग प्रणाली में कॉरपोरेट सेक्टर के बकाए में 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

अगर ग्रामीण बकाए की कॉरपोरेट बकाए से तुलना करें तो एसएचजी के माध्यम से 80 लाख महिलाओं पर 9,000 करोड़ रुपये का बकाया है। वहीं, केवल एक कर्जदार लॉयड स्टील पर ही 9,478 करोड़ रुपये का बकाया है जोकि 80 लाख महिलाओं के बकाए से कहीं अधिक है। यह कंपनी कारपोरेट एनपीए सूची में दूसरी सबसे ज्यादा बकाए वाली कंपनी है। ग्रामीण इलाकों में बकाए कर्जो के बढ़ने के कारणों की छानबीन से पता चला है कि बैंकों को कर्ज बांटने का सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य पूरा करना होता है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बैंक बिना जरूरी जांच पड़ताल के ही कर्ज दे रहे हैं।

उदाहरण के लिए कालघाटगी शहर में 1,907 स्त्री शक्ति एसएचजी हैं, जिनकी 25,000 से ज्यादा पंजीकृत सदस्य हैं, जबकि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, शहर की आबादी महज 17,000 है। लेकिन ऐसा इसलिए हुआ है कि कई महिलाएं एक से ज्यादा एसएचजी की सदस्य हैं। एनआरएलएम की वरिष्ठ मिशन अधिकारी (वित्तीय समावेशन) बी. लोकेश का कहना है, “एनआरएलएम कोई सरकारी सब्सिडी योजना नहीं है। यह मूलत: बैंकों के व्यापार बढ़ाने में मदद करनेवाली योजना है। आरबीआई के दिशा निर्देशों के मुताबिक एसएचजी को प्राथमिकता देनी है। इसका मतलब यह है कि बैंकों को अपने कुल कर्ज का एक निश्चित प्रतिशत एसएचजी को उधार देना है।”

बैंकों के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। शुरू में बैंक 50,000 का कर्ज एसएचजी को देता है। अगर उसकी समय से वापसी हो जाती है तो अगली बार 1 लाख रुपये उधार दिए जाते हैं, जो अगली बार बढ़कर 3 लाख हो जाता है। बैंकों के शाखा प्रबंधक एसएचजी का आकलन कर कितना कर्ज देना है यह निर्धारित करते हैं। औसतन हर स्वयंसहायता समूह को बैंकों ने 2.5 लाख रुपये कर्ज दिया है। धारवाड़ के उज्जीवन मिनी बैंक के फील्ड वर्कर वसंत गौड़ा का कहना है, “बैंक एसएचजी के साथ नियमित बैठक कर, पिछले कर्ज की समय से वापसी इत्यादि चीजों के आधार पर उनका आकलन करते हैं। बैंक कर्ज देने वक्त कर्ज का उद्देश्य नहीं पूछते।”

ताबाका दाहोन्नल्ली गांव के एसएचजी के सदस्य गौरव निगप्पा का कहना है, “कर्ज लेने के लिए लोग हाथ से लिखकर सरकारी अधिकारियों को आवेदन देते हैं। एक बार कर्ज मिलने के बाद वे उस पैसे का इस्तेमाल जिस उद्देश्य या व्यापार के लिए करने वाले थे। उस पर नहीं करते, बल्कि निजी कामों के लिए करने लगते हैं।”