पंजाब में चला अमरिंदर का जादू, अति आत्मविश्वास में बहुत कुछ गवां गए केजरीवाल !

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में हर तरफ भारतीय जनता पार्टी का डंका बजा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को प्रचंड जीत मिली लेकिन मणिपुर और गोवा में किसी को पूर्ण बहुमत ना मिल पाने की स्थिति में भाजपा ने जोड़-तोड़ की सरकार बनाई। लेकिन इन सब के बीच पंजाब में भाजपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में अकाली गठबंधन वाली सरकार को 18 सीटों से संतोष करना पड़ा, हालांकि इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी के भी पंजाब चुनाव ने पानी फेरा, कभी बहुमत का दावा करने वाले केजरीवाल को भी हार का मुंह देखना पड़। इन सबके बीच कांग्रेस के हाथों बाजी लगी जिसे प्रदेश में 77 सीटें प्राप्त हुई और 10 सालों से चला आ रहा अकाली का विजय रथ रुक गया।

पंजाब में कांग्रेस के जीत के कई मायने हैं, एकतरफ जहां पूरे देश विरोधियों ने कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान छेड़ा हुआ है, वहीं पंजाब में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मोराल बूस्टर का काम करने वाला है। पर इससे पार्टी के उस बड़े चेहरो को तब भी कोई खास लाभ मिलता नहीं दिख रहा है जिसे कांग्रेस लगातार लाइम लाइट में रखने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस पार्टी की पंजाब में जीत असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह की देन है ना कि राहुल गांधी की। पंजाब के पूरे चुनाव में न तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के परंपरागत ढांचे के मुताबिक चुनाव लड़ा और न ही वे राहुल गांधी की मेहरबानियों के मोहताज रहे। दिखने में भले ही यह कांग्रेस की जीत है, और कैप्टन भी इसे पंजाब की जनता की जीत बताकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं। लेकिन असल में पंजाब में जीता कौन? क्या राहुल गांधी जीते, या कांग्रेस की जीत हुई या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह?

यह सबसे बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए, क्योंकि अगर यह कांग्रेस की जीत है, तो फिर यूपी में तो काग्रेस ने सबसे ज्यादा मेहनत की थी और राहुल गांधी ने वहां पर खटिया भी बिछाई। लेकिन फिर भी यूपी में कांग्रेस का सफाया हो गया और यूपी का युवा राहुल गांधी की खटिया खड़ी करके चला गया। असल बात यह है कि पंजाब की जीत असल में कैप्टन अमरिंदर सिंह की निजी जीत है। और जो लोग इस तथ्य को नहीं स्वीकारते, उनके लिए सवाल है कि क्या राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस, कैप्टन के बिना पंजाब जीत पाती? पंजाब की इस जीत में गहरे जाकर यह समझना बहुत जरूरी हो गया है कि वास्तव में यह हुई कैसे। यह वह चुनाव था, जब पूरे देश में 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर थी, लेकिन पंजाब में लोगों ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली तक को अमृतसर में चारों खाने चित कर दिया था। वह अमरिंदर सिंह ही थे, जिन्होंने पंजाब में अपने को जनता का सबसे विश्वसनीय नेता साबित करके लोकसभा में भी मजबूत किया, और फिर वहां से इस्तीफा देकर पंजाब की राजनीति में और मजबूत होकर उभरे।

पंजाब की लड़ाई आखिर समय में आके कांग्रेस पार्टी ने जीती, लेकिन इस लड़ाई के कई लोगों को बहुत सारे सबक भी सिखाए, खास तौर से उस पार्टी को जिसको अत्यधिक आत्मविश्वास था। जी हां, हम बात आम आदमी पार्टी की कर रहे है, आत्मविश्वास का नाम यूं लिया गया कि चुनव के दौरान पंजाब चुनाव को लेकर आप काफी आतमविश्वास से से पूर्ण लग रही थी, इसके दो सबूत हैं पहला, चुनाव चार मार्च को एक सभा के दौरान पंजाब चुनाव को लेकर चर्चा हो रही थी, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह सहित कई बड़े लोग मौजूद थे, संजय सिंह ने पंजाब में सीएम पद के उम्मीदवार भगवंत मान को फोन किया और जीत की बधाई तक दे डाली, इसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ है, इतना ही नहीं संजय सिंह इस वीडियो में यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि 11वें चक्र के मतगणना तक पंजाब में आप को 100 से अधिक सीटों से अधिक पर जीत मिल चुकी है। बात में चुनाव हारने के बाद संजय सिंह ने मीडिया ने हंसी में बात को टाल तो जरुर दिया लेकिन उस दर्द को वो मीडिया के कैमरे से नहीं बचा पाए।

अति आत्मविश्वास का दूसरा मामला तब देखने को मिला जब पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा ने एक अंग्रजी चैनल पर बातचीत के दौरान यहां तक कह डाला कि अगर पार्टी को पंजाब में 85 सीटें नहीं मिलती है तो वह राजनीति करना छोड़ देंगे, इसके साथ ही उन्होंने नेशनल टीवी पर यहां तक कह डाला कि अगर पंजाब में 85 सीटें आ जाती हैं तो आप अपना चैनल बंद कर लीजिएगा।

पंजाब में कांग्रेस की जीत ने जहां पार्टी के भविष्य पर उठ रहे सवालों पर कुछ समय के लिए विराम लगा दिया है, वहीं आम आदमी पार्टी को असल राजनीति की सीख दी है। अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने हर कदम बड़ा सोच समझ कर रखा, चुनावी रणनीति बनाई, वहीं केजरीवाल का पूरा उद्देश्य दूसरों को गिरा कर स्वयं को उठाना रहा, जिसे समय रहते पंजाब की जनता ने भली भांति समझ लिया, इसी को अनुभव कहते हैं। बहरहाल इन 117 सीटों की राजनीति ने डेढ़ महीने में काफी रंग दिखाए, देखते हैं जिन पार्टी को जो कुछ भी सीख मिली है वह उसे अपने नजरिए से किस प्रकार से भविष्य में इस्तेमाल करते हैं।

 -अभिलाष श्रीवास्तव